पेरिस, मोने की नज़र से

The National Gallery, London

द नैशनल गैलरी, लंदन

एक्स्पोज़िशन यूनवर्सले
1867 में पेरिस के विश्व मेले 'एक्स्पोज़िशन यूनवर्सले' में लाखों की संख्या में लोग कला के बेजोड़ नमूनों को देखने के लिए अाए.युवा कलाकार मोने भी उन्हीं में से एक थे. इस मेले में दुनियाभर की नई कला, तकनीक और उद्योग की झलक देखने को मिली और साथ ही पेरिस एक आधुनिक महानगर के रूप में नज़र अाया.

इस मेले से प्रभावित होकर, मोने ने पेंटिंग बनाने के लिए शहरी विषयों पर अपनी खोज शुरू कर दी.

उस ज़माने में शहरों पर बनाई गई उनकी पेंटिंग को अगर देखें तो, एक कलाकार के रूप में अाधुनिक जीवन पर उनकी खास नज़र का पता चलता है.

उसी साल, मोने ने लूवाह में एक बालकनी से सेंट जर्मा औक्सेरुवा चर्च की पेंटिंग बनाई.संग्रहालय के अंदर की कला को देखने के बजाय मोने बाहर नीचे की तरफ़, चर्च के सामने जमा लोगों को देखते हैं.

तेजी से ब्रश चलाते हुए उन्होंने जिस खूबसूरती से पेड़ों की छाया को कैनवस पर उतारा है, उसमें गति और जीवन नज़र अाता है. यह चर्च की स्थिर खड़ी पुरानी इमारत से बिल्कुल उलट है.

स्ट्रीट व्यू में देखने से पता चलता है कि जिस नज़ारे को मोने ने पेंट किया था, वह अब भी कुछ खास नहीं बदला.

सेंट लज़ार स्टेशन
कुछ सालों बाद, 1877 में मोने ने पेरिस शहर के बीच में स्थित सेंट लज़ार स्टेशन की एक दर्ज़न पेंटिंग बनाईं.उन पर स्टेशन को पेंट करने की एेसी धुन सवार हो गई कि उन्होंने पास ही में किराये पर एक स्टूडियो भी ले लिया. अाप यहां इन तीन पेंटिंग को देख सकते हैं, इन सभी में ट्रेन को स्टेशन में आते हुए दिखाया गया है.

मोने जान-बूझकर अाधुनिक विषय चुन रहे थे; हालांकि, पेंटिंग में ट्रेन पहले भी कई बार देखी जा चुकी थीं लेकिन आम तौर पर पहले उन्हें मुख्य विषय के रूप में नहीं दिखाया जाता था क्योंकि उन्हें अाकर्षक नहीं माना जाता था.

स्टेशन के इस नज़ारे को मोने ने लैंडस्केप के अंदाज़ में दिखाया है, जिसमें आसमान की जगह स्टेशन की छत और पेड़ों की जगह मशीन से निकलने वाली भाप के अलग-अलग अाकार देखे जा सकते हैं.

सेंट लज़ार स्टेशन (पेरिस सेंट-लज़ार) अब एेसा दिखता है.

मोने का उपनगर में बसना
मोने और उनका परिवार 1871 में अर्ज़ोंतेय के उपनगर में जा बसा. मध्य पेरिस से उत्तर-पश्चिम में स्थित यह उपनगर, राजधानी से सड़क और रेलवे, दाेनों से जुड़ा हुअा था. सेंट लज़ार, इधर आने वाली ट्रेन का आखिरी स्टेशन था. अर्ज़ोंतेय एक एेसी जगह थी जो लगातार बदल रही थी. मोने के आने से पहले ही दो दशक में वहां की जनसंख्या लगभग दोगुनी हो गई थी.

जितने भी साल मोने अलग-अलग और बदलती जगहों पर रहे, उनकी पसंद अाधुनिकता ही रही, फिर चाहे वह भीड़-भाड़ वाला पुल हो, मध्यम वर्ग के रहने के सुंदर बंगले हों या फिर लोहे के कारखानों और ईंट भट्ठों की चिमनियां हों.

एक लैंडस्केप पेंटर के तौर पर मोने प्रकृति के अलग-अलग रूप और बदलते मौसम की ओर बहुत आकर्षित रहते थे. उन्होंने इसी अाकर्षण का इस्तेमाल अर्ज़ोंतेय उपनगर की तस्वीरों को और दिलचस्प बनाने के लिए किया.

इस पेंटिंग में उन्होंने सेन नदी में मौजूद छोटी नावों को दिखाया है. इन्हीं नावों की वजह से गर्मी के मौसम में लोग अर्ज़ोंतेय घूमने अाते थे.

जिस साल सर्दी में बहुत ज़्यादा बर्फ़ गिरी थी, उन्होंने बर्फ़ की चादर अोढ़े अर्ज़ोंतेय के 18 अलग-अलग नज़ारों की पेंटिंग बनाईं. उनके इसी काम की तरह और भी कई पेंटिंग में, उनकी गली – बुलवार्ड सेंट-डेनिस – दिखाई देती है जो रेलवे स्टेशन से सेन नदी की अोर जाती है.

मोने ने इस पेटिंग में आस-पास के माहौल को दिखाने के लिए उसकी बारीकियों को नज़रंदाज कर दिया. आसमान को ज़्यादातर नीले और स्लेटी रंगों से रंगा गया है. इससे सर्दी में बादलों से घिरी दोपहर का सूनापन साफ़ नज़र आ रहा है.

अाज का अर्ज़ोंतेय
हालांकि मोने के समय से लेकर अब तक, अर्ज़ोंतेय बहुत ज़्यादा बदल गया है मगर अाप अभी भी उस गली को देख सकते हैं (अब इसे बुलवार्ड कार्ल मार्क्स के नाम से जाना जाता है). अाप वह घर भी देख सकते हैं जहां वह अपने परिवार के साथ रहते थे.
क्रेडिट: सभी मीडिया
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