18 नव॰ 1901 - 28 अक्तू॰ 1990

व्ही. शांताराम

V. Shantaram Motion Picture Scientific Research and Cultural Foundation

भारतीय सिनेमा के महापुरुष

भारतीय सिनेमा के अग्रदूत
सिनेमा ने - फिर वह चाहे राष्ट्रीय हो या आंतरराष्ट्रीय - शायद ही कभी व्ही. शांताराम जैसा संपूर्ण फ़िल्मकार देखा हो। एक संपूर्ण अभिनेता, नित नए की खोज करता एक फिल्म-एडिटर (संपादक), गहरी पहुँच रखनेवाला निर्देशक एवं निर्माता। वह बहुमुखी प्रतिभा के फ़िल्मकार थे. उन्होंने फ़िल्म निर्माण की एक नई शैली विकसित की और फ़िल्मों का नया व्याकरण तैयार किया। अभिनेता की हैसियत से उन्होंने अपने ही निर्देशन में बनी कम से कम दो महत्त्वपूर्ण फिल्मों में काम किया। निर्माता की हैसियत से उनकी फिल्में पहले उपनिवेशवादी हुकूमत के खिलाफ़ संघर्ष करते और बाद में राष्ट्र की हैसियत से अपना स्थान बनाने की कोशिश में लगे समाज की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक समस्याओं को उजागर करती रहीं।

बीसवीं सदी के आरंभ में, हिलती चित्रों के नए माध्यम के जन्म के पाँच साल बाद जन्मे व्ही. शांताराम मूक फिल्मों के आरंभिक दौर से लेकर 1980 के दशक में उभरी डिजिटल तकनीकी तक सिनेमा के तकनीकी सफ़र के साक्षी रहे।

बोलती फ़िल्मों के शुरुआती दौर में अपने आप को एक होनहार निर्देशक के तौर पर साबित किया और अपने जीवनकाल में ही फ़िल्मों की दुनिया की एक जानी-मानी हस्ती बन गए. अपने लंबे फ़िल्मी करियर में उन्होंने 92 फ़िल्में बनाईं, 55 फ़िल्मों का निर्देशन किया और 25 फ़िल्मों में अभिनय किया.

राजाराम और कमला के घर 18 नवंबर 1901 को, यानी सिनेमा के जन्म के केवल पाँच साल बाद शांताराम राजाराम वणकुद्रे का जन्म हुआ। पिता राजाराम एक ग़रीब दुकानदार थे और अपनी टटपूँजी कमाई में और थोड़ा इज़ाफ़ा करने के लिए, रात में संगीत नाटक खेला करनेवाली नाटक कंपनियों को पेट्रोमैक्स की बत्तियाँ किराये पर दिया करते थे।

पाँच भाइयों में शांताराम दूसरे थे। घर की ख़स्ता हालत के बावजूद बचपन हँसी-ख़ुशी और क़रीब क़रीब लाड़-प्यार में ही गुज़रा। पढ़ाई में बहुत रुचि थी नहीं। स्कूल इसलिए जाते थे क्यों कि उसे टाल नहीं सकते थे।

स्कूल में पढ़ाई की अपेक्षा शांताराम का रुझान अन्य गतिविधियों की तरफ़ अधिक रहा। इसीके चलते एक कुशल नक़लची के रूप में उनकी शोहरत बढ़ी और अक्सर मंच पर उन्हें मिमिक्री करने के लिए कहा जाने लगा।

ऐसे ही एक कार्यक्रम के दौरान महान रंगमंच कलाकार गोविंदराव टेंबे ने उन्हें देखा और उन्होंने गणपतराव बोडस एवं बालगंधर्व के साथ मिलकर बनाई अपनी गंधर्व नाटक मंडली में उन्हें भर्ती करा लिया। किर्लोस्कर नाटक मंडली से विदा लेने के बाद उन्होंने यह नाटक मंडली बनाई थी।


लेकिन गंधर्व नाटक मंडली में एक बहुत बड़ा सदमा शांताराम का इंतज़ार कर रहा था। पहले ही दिन उन्हें पता चल गया कि वे न तो गा सकते हैं और न ही संगीत की उन्हें कोई समझ है। दौर संगीत नाटकों का था और संगीत का ज्ञान न होना शांताराम के लिए बुरा साबित हुआ।

ज़्यादा से ज़्यादा वे एक जुनियर आर्टिस्ट या बैक-स्टेज आर्टिस्ट बन सकते थे। लेकिन एक साल बाद शांताराम घर वापस लौटे, नाटक का रुख़ कभी न करने के लिए। बिना कुछ किए ही एक साल बरबाद कर दिया, यह ख़याल दिल को कचोटता रहा और कुछ बनने का प्रण करके शांताराम फिर स्कूल जाने लगे।

परिवार की आर्थिक परिस्थितियाँ बिगड़ती जा रही थीं और पढ़ाई में भी शांताराम कोई ख़ास तरक़्क़ी नहीं कर पा रहे थे। आख़िरकार परिवार के एक दोस्त ने उन्हें रेलवे वर्कशॉप में एक नौकरी पर लगवा दिया।

कड़ी मेहनत करना उनका स्वभाव ही था। वर्कशाप में भी उनकी कड़ी मेहनत से प्रभावित होकर सुपरवाइज़र ने उन्हें स्वतंत्र रूप से एक छोटे से विभाग की पूरी ज़िम्मेदारी सौंप दी। तनख़्वाह भी बढ़कर रोज़ाना पूरे 12 आने हो गई।एक गंभीर दुर्घटना में शांताराम के दाएं हाथ की दो उंगलियां ज़ख्मी न हुई होतीं तो वह और भी ज़्यादा तरक्की करते - ज़ख्म के निशान आखिर तक उनकी उंगलियों पर रहे।

परिवार की मदद करने के लिए नौकरी ढूँढ़ते हुए शांताराम को अहसास हुआ कि कला के प्रति उनका रुझान अब भी बना हुआ है। अचानक एक ख़याल आया। उनके मौसेरे भाई बाबुराव पेंढारकर मशहूर महाराष्ट्र फिल्म कंपनी के मैनेजर थे। शांताराम उनके पास नौकरी माँगने गए।

भविष्य के अपने गुरु से शांताराम की यह पहली मुलाक़ात थी। ये थे प्रसिद्ध फ़िल्मकार एवं चित्रकार बाबुराव कृष्णराव मेस्त्री जो बाबुराव पेंटर के नाम से भी जाने जाते थे। स्वतंत्रता-संग्राम के जाने माने सेनानी लोकमान्य तिलक ने उन्हें ‘सिनेमा केसरी’ के ख़िताब से नवाज़ा था।

जब शांताराम पहुँचे, तो बाबुराव पेंटर ने अपने कैनवास के पीछे से झाँका और अपने सामने एक पतले-दुबले से आदमी को खड़ा पाया जिसकी आँखों में बहुत तेज था। बिना कुछ कहे वह अपने कैनवास पर लौट गए। शांताराम मन मसोसकर रह गए, लेकिन बाबुराव ने ऊँची आवाज़ में पेंटर से पुछा, "क्या कहते हो, इसे रख लिया जाए ?" अपनी रंगों की दुनिया में खोए पेंटर ने बस एक हल्की-सी हामी भरी। शांताराम को नौकरी मिल गई।

1919 में जब शांताराम महाराष्ट्र फ़िल्म कंपनी में दाख़िल हुए तब तक बाबुराव पेंटर का बड़ा नाम हो चुका था। कंपनी फ़िल्म निर्माण का एक केंद्र बन चुकी थी और इस नए माध्यम में करिअर बनाने के इच्छुक युवाओं के लिए प्रशिक्षण का एक आदर्श केंद्र साबित हो रही थी।

फ़िल्म कंपनी में दाख़िल में होने वाले हर नए व्यक्ति से यही उम्मीद की जाती थी कि वह फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में काम करे और जितना हो सके उतना सीख सके। माना जाता है कि आने वाले सालों में बाबुराव पेंटर की संस्था ने मराठी फ़िल्म इंडस्ट्री को अलग-अलग विभागों से जुड़े 250-300 से ज़्यादा काम करने वाले लोग दिए

एक नई सुबह
कुछ नया, कुछ निराला, साहसिक काम करने की लगन कुलाँचें भर रही थी शांताराम के अंदर। उनके जैसे ही तीन और व्यक्ति थे। वे अपनी ख़ुद की कंपनी स्थापित करना चाहते थे और उन्होंने फ़ाइनांसर को भी मना लिया था। व्ही. शांताराम, केशवराव धायबर, विष्णुपंत दामले और एस. फतेलाल - चारों साझीदार बनने जा रहे थे। पाँचवें साझीदार बने उनके फ़ाइनांसर सीताराम कुलकर्णी। कोल्हापुर की मंगलवार पेठ में प्रभात फिल्म कंपनी की नींव रखी गई। तारीख़ थी 1 जून 1929।

महाराष्ट्र फिल्म कंपनी में बाबुराव पेंटर ने अपनी महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक फिल्म नेताजी पालकर (1927) के निर्देशन की ज़िम्मेदारी सौंपी थी, उसीके साथ निर्देशक की हैसियत से शांताराम का करिअर शुरू हो ही चुका था। यह फ़िल्म शिवाजी के सेनापति के कारनामों पर आधारित थी। यह तस्वीर शांताराम की (1923) में बनी शिवाजी पर आघारीत फ़िल्म सिंहगढ़ से है।

शांताराम के सह-निर्देशक थे केशवराव धायबर। दोनों ने मिलकर प्रभात में और पाँच फिल्में बनाईं। पहली थी गोपालकृष्ण (1929) जो अत्यधिक सफल रही। कृष्ण की भूमिका में थे मा. सुरेश। फ़िल्म में बैलगाड़ियों की दौड़ के दृश्य की बड़ी चर्चा रही। इसके बाद शांताराम ने तय किया कि प्रभात की हर फ़िल्म में कोई न कोई ऐसा आकर्षण ज़रूर पैदा किया जाय जिससे दर्शकों को वह बाक़ी फिल्मों से बढ़कर लगे।

व्ही. शांताराम की अगली फ़िल्म उदयकाल अर्थात थंडर ऑफ द हिल्स (1931) राजा शिवाजी की वीरता की कहानी कहती थी। शांताराम ने न केवल इसका निर्देशन किया, बल्कि उन्होंने शिवाजी की भूमिका भी निभाई। पहले इसका नाम स्वराज्याचे तोरण रखा गया था, लेकिन सेंसर बोर्ड को इसमें स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार नज़र आया, इसलिए इसका नाम बदला गया।

भारत की पहली बोलती फ़िल्म थी आलम आरा। प्रभात के पाँचों साझीदारों ने तय किया कि हम भी अपनी पहली बोलती फ़िल्म बनाएँगे। लेकिन उनके लिए एक और फ़ैसला लेना ज़रूरी था। उन दिनों बोलती फिल्म के लिए फिल्मांकन करते समय बाक़ी कोई आवाज़ न आने पाए यह ज़रूरी होता था। इसलिए यह फ़ैसला लेना ज़रूरी हो गया कि शहर के बिलकुल बीच मंगलवार पेठ में बने स्टूडियो को ताराबाई पार्क (यह उस समय कोल्हापुर शहर के बाहर था।) ले जाया जाए।

अयोध्येचा राजा (मराठी), उर्फ़ अयोध्या का राजा (हिंदी) ( 1932) भारत की पहली द्विभाषिक फ़िल्म साबित हुई। दोनों भाषाओं में फ़िल्म बनाने का यह फ़ैसला न केवल प्रभात के लिए महत्त्वपूर्ण था, बल्कि पूरे फ़िल्म उद्योग के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुआ। इस फ़िल्म ने 1930 के दशक में पश्चिमी भारत में बनी सभी फ़िल्मों के लिए एक मिसाल कायम कर दी।

मराठी सिनेमा के पहले साल में कुल आठ फ़िल्में बनीं, उनमें से तीन प्रभात फिल्म कंपनी की थीं - अयोध्येचा राजा, अग्निकंकण और माया मच्छिंद्र। तीनों के निर्देशक शांताराम थे।

1933 में शांताराम ने भारत की पहली रंगीन फ़िल्म बनाना शुरू किया। महाभारत के लोकप्रिय चरित्र पर आधारित थी सैरंध्री। भारत में ही प्रभात स्टुडिओ में इस रंगीन फ़िल्म का फिल्मांकन किया गया और आगे की प्रक्रिया के लिए इसे जर्मनी के उफ़ा स्टुडिओ भेजा गया। लेकिन अंतिम परिणाम प्रदर्शन के लायक न पाकर प्रभात के साझीदारों ने इसे इसे न दिखाने का फ़ैसला लिया।

तीन महत्वपूर्ण फिल्में
सैरंध्री के बनने के दौरान ही साझीदारों ने प्रभात कंपनी को कोल्हापुर से पुणे ले जाना तय किया। भविष्य में अधिक विस्तार की दृष्टि से एवं बिजली जैसी सुविधाओं की उपलब्धता को देखते हुए पुणे कहीं अधिक सुविधाजनक था। इसके अलावा पुणे मुंबई के अपेक्षाकृत नज़दीक पड़ता था और मुंबई धीरे धीरे फ़िल्म निर्माण और वितरण के महत्त्वपूर्ण, बहुवांशिक-बहुभाषिक केंद्र के रूप में उभरता जा रहा था। पुणे में बनाए नए साऊंडप्रूफ़ टिन के स्टुडिओ में जो पहली फ़िल्म बनाई गई, वह थी <b>अमृत मंथन</b> (1934)।

सैरंध्री के काम के दौरान शांताराम जब जर्मनी के उफ़ा स्टुडिओ में थे, उन दिनों उन्होंने जर्मन एक्सप्रेशनिस्ट फिल्मकारों की कलाकृतियों का अध्ययन किया, जिससे प्रभावित होकर अमृत मंथन (1933) में उन्होंने छाया-प्रकाश के नए प्रयोग किए।

नारायण हरि आपटे के उपन्यास भाग्यश्री पर आधारित इस फ़िल्म में एक सुधारवादी राजा और उसके दक़ियानूसी राजगुरु का संघर्ष दिखाया गया है। राजगुरु पशुबलि चढ़ाने की बात पर अड़ा हुआ है और अंततः बलि की माँग करनेवाली देवी के सामने वह ख़ुद अपना सिर अर्पण कर देता है। फ़िल्म धार्मिक अंधविश्वास और धार्मिक कट्टरता के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है।

शांताराम वह पहले भारतीय निर्देशक थे जिन्होंने अमृत मंथन में क्लोज अप फिल्माने के लिए टेलीफोटो लेन्स का इस्तेमाल किया। यह टेलीफ़ोटो लेंस जर्मनी से मंगवाया गया था। राजगुरु की विद्वेष से भरी आँख जब पूरे परदे पर छा गई तब 1930 के दौर के दर्शक बेतरह चौंक गए थे और इसकी बड़ी चर्चा रही।

एक ही सिनेमाघर में 25 हफ़्ते चलने वाली अमृत मंथन सिल्वर जुबली मनाने वाली पहली हिंदी फ़िल्म साबित हुई।

अमर ज्योति (1936) में शांताराम ने नई शैली अपनाई। यह कहानी है एक रानी की, राज्य की पुरुषप्रधान व्यवस्था के चलते जिसे अपने बेटे पर अधिकार नहीं दिया जाता और जो परिणामस्वरूप समुद्री डकैत बन जाती है।

ऊपरी तौर पर राजा-रानियोंवाली साहसकथा लगने के बावजूद यह फ़िल्म नारी मुक्ति का नारा बुलंद करती है। दुर्गा खोटे, शांता आपटे और वासंती घोरपड़े की भूमिकाओं की वजह से इस फ़िल्म का बॉक्स ऑफिस पर लंबे समय तक चलना तय था।

अमृत मंथन और अमर ज्योति ने भारतीय फ़िल्म-निर्माण की एक नई शैली और नई व्याकरण ईजाद की। ताज़ा विषय थे, सुगठित पटकथाएँ थीं, दृश्य चटपटे थे और ये फ़िल्में अपने आप में बहुत साफ़ सुथरी बनी थीं।

लेकिन ये साल तो महज़ आनेवाले पाँच सालों के उस जगमगाते दौर (1937-42) की तैयारी कर रहे थे, जब प्रभात में सामाजिक महत्त्व की तीन बेहतरीन फ़िल्में बननेवाली थीं। वे फ़िल्में जिन्होंने राष्ट्रीय मानचित्र पर प्रभात का स्थान बना दिया और हर समय के एक महान फ़िल्मकार के रूप व्ही. शांताराम की शोहरत को पुख़्ता कर दिया।

इन तीन फ़िल्मों में से पहली फिल्म थी कुंकू (मराठी) अर्थात दुनिया ना माने (हिंदी) (1937) । नारायण हरि आपटे के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित यह फ़िल्म एक साथ बेमेल विवाह की समस्या से जूझती हुई नारी मुक्ति के लिए आवाज़ उठाती है।

केशवराव दाते ने बूढ़े पति की भूमिका निभाई थी जो एक युवा लड़की (शांता आपटे) से शादी करता है। यह लड़की इस विवाह को मानने से इनकार करती हुई अन्याय की अपेक्षा सामाजिक क्रोध का शिकार होना पसंद करती है।

अगली फ़िल्म माणूस (मराठी) अर्थात आदमी (हिंदी) – लाइफ इज फॉर लिविंग (1939) एक अलग ही विषय पर बनी थी। एक ईमानदार पुलिसवाला एक वेश्या से प्यार करता है और उसे सामाजिक प्रतिष्ठा का जीवन दिलाने की कोशिश करता है।

अक्सर यह कहा जाता है कि हिंदी फ़िल्म देवदास की लोकप्रियता से देश के युवा जिस रोमँटिक हताशा की चपेट में आ रहे थे, उन्हें हताशा से निकल जीवन की तरफ़ मुड़ने की प्रेरणा देने के इरादे से शांताराम ने यह फ़िल्म बनाई। फिल्म का उपशीर्षक लाइफ इज फॉर लिविंग इसी बात को स्पष्ट करता है।

तीन फ़िल्मों में से आख़री फ़िल्म थी शेजारी (मराठी) अर्थात पड़ोसी (हिंदी)। यह प्रभात कंपनी के लिए शांताराम की आख़री फ़िल्म थी। 1941 में बनी इस फिल्म में दो पड़ोसियों- जिनमें एक हिंदू है और दूसरा मुस्लिम – के बदलते रिश्ते की कहानी बयान की गई है।

कहानी में कई अन्य कथासूत्र भी चलते रहते हैं, लेकिन इसका मुख्य केंद्र है ये दो पड़ोसी जो सांप्रदायिक सामंजस्य पर विश्वास करते हैं और गाँव का भला चाहते हैं। जब उनमें लड़ाई हो जाती है तब यही विश्वास, यही प्यार टूटकर बिखर जाता है।

राजकमल कलामंदिर की स्थापना
प्रभात में बहुत बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल करने के बाद अब समय आ गया था अलग होने का। शांताराम की प्रतिभा दायरे में सिमटकर नहीं रह सकती थी। लिहाज़ा उन्होंने पुणे से मुंबई आना तय कर लिया।प्रभात अगर एक शुरुआत थी, तो राजकमल उनका आखिरी पड़ाव। 1942 में उनका बनाया राजकमल कलामंदिर स्टुडिओ पिता राजाराम और माता कमला के प्रति उनकी श्रद्धांजलि का प्रतीक था।

डॉ. कोटणीस की अमर कहानी प्रदर्शित हुई तो शांताराम ने इसका नए सिरे से संपादन कर अंग्रेज़ी वर्शन बनाया – द जर्नी ऑफ डॉ. कोटणीस। अंग्रेज़ी वर्शन लंदन की इंडिया लीग में दिखाई गई और बाद में इंग्लैंड में वितरण के लिए इसे ख़रीद लिया गया।

अमरीका में भी यह अच्छी सफलता पा सकती है सोचकर वहाँ इसे बेचने के इरादे से शांताराम अमरीका गए। फिल्म शकुंतला भी वहाँ सफल हो सकती है यह सोचकर वे साथ ही साथ यह फ़िल्म भी ले गए।

दोनों फ़िल्मों का वितरण मेयर एण्ड बर्स्टिन ने किया और अमरीका में इनका अच्छा स्वागत हुआ। ‘फ़िल्म डेली’ ने तो शकुंतला पर एक लेख भी छापा।

अमरीका जाने से पहले शांताराम ने ग. दि. माडगुलकर की लिखी एक पटकथा पढ़ी। यह 19 वीं सदी के एक ब्राह्मण कवि राम जोशी की जीवनी पर आधारित थी, जिन्होंने अपना जीवन ‘तमाशा’ लोककला को समर्पित करते हुए ‘लावणी’ नामक बेहूदा समझी जानेवाली रोमांटिक गीत विधा को अपना योगदान दिया। फ़िल्म लोकशाहीर राम जोशी(मराठी) अर्थात मतवाला शायर राम जोशी (हिंदी) (1947) का निर्देशन शांताराम के गुरु बाबुराव पेंटर को सौंपा गया था। लेकिन अमरीका से लौटकर खुद शांताराम को इसे नए सिरे से बनाना और पूरा करना पड़ा।

फ़िल्म अमर भूपाली (मराठी) अर्थात द इम्मार्टल साँग ( अंग्रेजी) – ल चँट इम्मार्तेल (फ्रेंच) – (1951) होनाजी बाला नामक कवि के जीवन पर आधारित थी और यह भूमिका निभाई थी गायक-अभिनेता पंडितराव नगरकर ने। कान फ़िल्म समारोह में पैरिस के सेंटर नैशनल डी ला सिनेमाटोग्राफिक द्वारा इसे सर्वश्रेष्ठ साऊंड रेकॉर्डिंग के लिए ग्रां प्री पुरस्कार दिया गया।

सामाजिक विषय पर 1953 में बनीं दोनों फ़िल्में - सुरंग और सुबह का तारा जब नहीं चलीं, तो शांताराम समझ गए कि 1950 के दौर का नया दर्शक अब सिर्फ़ मनोरंजन चाहता है।

पुराने ज़माने की एक कहानी पर उन्होंने झनक झनक पायल बाजे (1955) बनाई। नृत्यप्रधान इस भव्य फ़िल्म के साथ उन्होंने रंगीन फ़िल्मों के युग में क़दम रखा। संदेश तो कोई नहीं था, लेकिन फ़िल्म नृत्य, संगीत और रंगों में सराबोर थी। दो नर्तकों की यह प्रेमकहानी नृत्यात्मक शैली में ही पेश की गई थी। फ़िल्म बेहद सफल रही और यह भारतीय सिनेमा के सफ़र में एक मील का पत्थर मानी जाती है।

अपनी अगली फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ (1957) के साथ शांतराम फिर अपनी खास शैली की तरफ़ लौट आए। शांताराम की क्षमता का इम्तहान था यह जैसे – मनोरंजन और सामाजिक संदेश का बेहतरीन संगम। फ़िल्म की कहानी, आज़ादी से पहले के भारत की छोटी-सी रियासत औंध में घटी सच्ची घटना पर आधारित है।

दो आँखें बारह हाथ एक आदर्शवादी जेलर की कहानी है। खुले कारागार में कैदियों को सुधरने का मौक़ा देने की अपनी संकल्पना पर अमल करने की इजाज़त उसे दी जाती है जिसके तहत वह छः खूँख़्वार अपराधियों को एक साथ रखते हुए अपनी नैतिक प्रेरणा के बल पर सुधार देता है।

विषय सामने आते ही शांताराम समझ गए कि अगर इसे सही मायनों में असरदार बनाना है तो ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म ही बनानी पड़ेगी। जो चलन ख़ुद ही शुरू किया हो, उसके खिलाफ़ जाने के लिए बड़े साहस की ज़रूरत होती है। शांताराम की फिल्मकला की बेहतरीन यादगार यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से भी बेहद सफल रही।

दो आँखें बारह हाथ के बाद शांताराम फिर ज़ोर शोर के साथ मनोरंजनप्रधान फिल्मों की तरफ़ मुड़े। शायद पहलेवाली फिल्म को व्यवसाय और कला की कसौटी पर मिली बहुत बड़ी सफलता का यह तकाज़ा था या फिर बदलते समय की माँग।

हमेशा नई धारा प्रवाहित करने को उत्सुक रहते थे शांताराम। बाक़ी लोग अभी रंगीन फ़िल्मों बनाने के बारे में सोच ही रहे थे और शांताराम ने रंगीन फ़िल्म बनाली - नवरंग (1959)। रोमान्स, रंग, गीत, नृत्य, बीते दिनों का दिलकश माहौल और दिलचस्प कहानी। लिहाज़ा नवरंग बेहद सफल रही।


अब की शांताराम के नए नए सिनेमैटिक प्रयोग ज़्यादातर गीतों को अपना लक्ष्य बनाने लगे। लगता था अब उन्होंने गीतों और नृत्यों की भरमार करते हुए भव्य मनोरंजन के नए दौर में क़दम रखा था।

स्त्री (1961), सेहरा (1963), गीत गाया पत्थरों ने (1964) और बूँद जो बन गई मोती (1967) – ये फ़िल्में दर्शकों को लुभाने के लिए संगीत और मनोरंजक कहानी का अच्छा तालमेल पेश कर रही थीं। जादुई असर करनेवाली बेहतरीन फ़िल्में बनानेवाले फिल्मकार के रूप में शांताराम को जो शोहरत हासिल थी वह बनी रही।

शांताराम की अगली दो फ़िल्मों - लड़की सह्याद्री की (मराठी) अर्थात इये मराठीचिये नगरी (मराठी) और जल बिन मछली नृत्य बिन बिजली - को व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। लेकिन पिंजरा (1972) ने महाराष्ट्र के दर्शकों का दिल जीत लिया।

द ब्लू एंजल (1930) नाम की जर्मन फ़िल्म की कहानी पर बनी थी यह। मराठी फ़िल्मकार अनंत माने ने यह पटकथा लिखी थी, जिसमें एक आदर्शवादी स्कूलमास्टर (डॉ. श्रीराम लागू) को एक नर्तकी( संध्या) अपने प्रेम के जाल में फँसा लेती है और अंत में अपनी ही हत्या का इल्ज़ाम स्कूलमास्टर पर लगाया जाता है।

श्रीधर पंत को लगता है कि उन्होंने अपने अंदर के आदर्शवादी स्कूलमास्टर की हत्या की है। इसलिए वे अपराध स्वीकार करते हैं।पिंजरा (1972) पहली रंगीन मराठी फ़िल्म थी। कहानी, सामाजिक माहौल और नृत्य एवं गीतों के मौक़े का सही मेल था इस फ़िल्म में। एक समय के सफलतम शांताराम फिर चोटी पर थे और फ़िल्म बेहद सफल।

शांताराम कहानी कहने की कला के उस्ताद थे इसका सबूत न सिर्फ़ उऩके बड़ी ख़ूबसूरती से किए गए दृश्य-संयोजन में मिलता है, बल्कि कहानियों के उनके चुनाव से भी वह साफ़ पता चलता है।

1920-30 के दशकों में जब हर कोई पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों पर निर्भर कर रहा था, तब शांताराम ने समसामयिक विषय पर अपनी टिप्पणियाँ पेश कीं। उन्होंने कभी कोई पटकथा नहीं लिखी, लेकिन पटकथा पर उनकी निराली छाप हमेशा मौजूद रही।

आंतरराष्ट्रीय स्तर के महान निर्देशक के रूप में शांताराम को जो शोहरत मिली, वह इसलिए कि वे एक महान कारीगर और तकनीशियन थे। सिनेमा की तकनीक को समझने और उसे प्रयुक्त करने की क्षमता ने उन्हें तकनीक में महारत दिलवा दी, जो उनकी फ़िल्मों में साफ़ झलकती है।

सिनेमा की तकनीकी को लेकर यह प्यार शांताराम को मिला था अपने गुरु बाबुराव पेंटर से। फ़िल्म-निर्माण में अलग अलग तकनीशियनों की भूमिका को वे बख़ूबी पहचानते थे और फ़िल्म बनाते समय उनका सही तालमेल बिठाते थे। निर्देशक की हैसियत से शायद यही उनका सबसे बड़ा योगदान है।

गीतों का फ़िल्मांकन
गीतों के फ़िल्मांकन पर शांताराम विशेष ध्यान दिया करते थे। वैसे भी भारतीय फ़िल्मों में गीत-नृत्य पर ख़ास ध्यान दिया जाता है।

पड़ोसी के लिए ओवरहेड कैमरे से रात में फ़िल्माया गया गीत-नृत्य बेहद लुभावना था और इससे गीतों के फ़िल्मांकन की नई तकनीक उभर कर सामने आई जो कि आगे चलकर 1950 के दशक का चलन बन गई।

आने वाले सालों में, रंगीन फ़िल्मों के दौर में बनी उनकी मनोरंजन प्रधान फ़िल्मों में शांताराम के किए अधिकतर नए प्रयोग, गीतों के फ़िल्मांकन को ध्यान में रखकर ही किए गए थे ।

झनक झनक पायल बाजे और नवरंग जैसी फ़िल्मों का अधिकतर प्रभाव कहानी की अपेक्षा गीतों के फ़िल्मांकन से पैदा हुआ है, इस बात को नज़र अंदाज नहीं किया जा सकता।

पुरस्कार और सम्मान

फ़िल्म अमर भूपाली को कान फिल्म समारोह में बेहतरीन साऊंड रिकॉर्डिंग के लिए ग्रां प्री पुरस्कार दिया गया।

व्ही. शांताराम की कई फ़िल्मों को कई राष्ट्रीय और आंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले, लेकिन सबसे ऊंचा सम्मान फ़िल्म दो आँखें बारह हाथ (1957) को मिला।। यह फ़िल्म बर्लिन फ़िल्म समारोह में ‘सिल्वर बेअर अवार्ड’ से सम्मानित हुई, जो कि ज्युरी द्वारा दिया जानेवाला असाधारण पुरस्कार होता है । इस फ़िल्म को इंटरनैशनल कैथलिक सिनेमाटोग्राफिक ब्युरो का ख़ास पुरस्कार भी मिला।

हॉलीवुड प्रेस एसोसिएशन ने बेहतरीन विदेशी फ़िल्म के लिए दिए जाने वाले सैम्युएल गोल्डविन इंटरनैशनल फ़िल्म अवार्ड से इसे सम्मानित किया। इसमें कोई शक नहीं कि अभिनेता-निर्माता-निर्देशक की हैसियत से दो आँखें बारह हाथ शांताराम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

1980 में नागपुर विश्वविद्यालय ने व्ही. शांताराम को डी. लिट् की उपाधि से सम्मानित किया।

1986 में व्ही. शांताराम को भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च पुरस्कार - दादासाहब फाल्के पुरस्कार – देकर उनके योगदान का सम्मान किया गया।

अपने 89 साल के जीवनकाल के 79 वर्ष भारत के मनोरंजन उद्योग को देने वाले व्ही. शांताराम को भारतीय फ़िल्म उद्योग का अहम हिस्सा माना जाता है और उन्हें हिन्दी फ़िल्मों का एक लेजेंड कहा जाता है। वे ख़ुद अपनी बनाई हुई संस्थाओं से भी कहीं ज़्यादा बड़ी संस्था थे, जिसमें भारतीय सिनेमा का इतिहास समाया हुआ है।

आभार: कहानी

चित्र – व्ही. शांताराम चलच्चित्र वैज्ञानिक अनुसंधान और सांस्कृतिक प्रतिष्ठान के संग्रहालय।

व्ही. शांताराम के सुपुत्र किरण वी. शांताराम का विशेष आभार।

पाठ और क्यूरेशन – संजीत नार्वेकर

निविष्टियां – विनय नेवालकर

हिंदी अनुवाद – रेखा देशपांडे

क्रेडिट: सभी मीडिया
कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि पेश की गई कहानी किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष ने बनाई हो और वह नीचे दिए गए उन संस्थानों की सोच से मेल न खाती हो, जिन्होंने यह सामग्री आप तक पहुंचाई है.
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