जॉर्ज मेलियेस

The Cinémathèque française

“इस दौर में थोड़े जादू और थोड़े सपनों के बिना ज़िंदा रहना कहां मुमकिन है?”

मेलियेस: एक जादूगर की कहानी
जॉर्ज मेलियेस का जन्म 8 दिसंबर 1861 को पेरिस में हुआ था. सिनेमा के शुरुआती दौर के मुख्य फ़िल्म निर्माताओं में से एक बनने से पहले, जॉर्ज मेलियेस एक शानदार जादूगर थे. अपना फ़िल्मी सफ़र शुरू करने के बाद भी, उन्होंने जादू करना नहीं छोड़ा. बचपन से ही, मेलियेस को कठपुतलियां बहुत पसंद थीं. जादू की दुनिया से उनका परिचय करवाने का श्रेय उस दौर के दो महान जादूगरों, जॉन मेस्कलीन और डेविड डिवांट को जाता है.
रॉबे-हुडैन: एक गुरु
जुलाई 1888 में मेलियेस ने अपने पिता से मिले पैसों से एक छोटा जादू दिखाने वाला थिएटर खरीदा. यह थिएटर, उनके गुरु जॉन-इयुजेन रॉबे-हुडैन का था.
इसी थिएटर में मेलियेस ने जादू की कला को निखार कर अपनी कल्पना को पंख दिए. मेलियेस यहां शानदार जादू दिखाया करते थे और छोटे-छोटे मज़ाकिया नाटक किया करते थे.
सिनमैटोग्राफ़ की शुरुआत
1895 के अंत में, लुमिएर भाइयों के बनाए सिनमैटोग्राफ़ को पहली बार दुनिया के सामने लाया गया. ऐसी ही एक प्रदर्शनी में जॉर्ज मेलियेस ने उस सिनमैटोग्राफ़ को पहली बार देखा और देखते ही रह गए. मेलियेस और वहां मौजूद सभी दर्शकों के “मुंह आश्चर्य से खुले रह गए थे और वे इतने हैरान थे कि उनके पास अपने अनुभव को बयां करने के लिए शब्द नहीं थे.” मेलियेस ने उसी समय अंदाज़ा लगा लिया कि "लुमिएर सिनमैटोग्राफ़" के ज़रिए कितने शानदार और जादुई काम किए जा सकते हैं.
सिनेमा की दुनिया में पहला कदम
हालांकि, लुमिएर भाइयों ने उस डिवाइस की कॉपी बेचने से साफ़ मना कर दिया था. उनका मानना था कि “आने वाले समय में यह आविष्कार किसी काम का नहीं होगा.” यह मेलियेस की खुशकिस्मती थी कि उन्हें लंदन में उस सिनमैटोग्राफ़ जैसा ही एक डिवाइस मिल गया. इस डिवाइस का आविष्कार रोबर्ट विलियम पॉल ने किया था, जो वैज्ञानिक यंत्र बनाते थे.

एक साल बाद, मेलियेस ने अपनी पहली फ़िल्म पूरी की लेकिन वह लुमिएर भाइयों की फ़िल्म जैसी ही थी. हालांकि, 1896 में उन्होंने “द वैनिशिंग लेडी” नाम की एक (साइलेंट फ़िल्में जो स्पेशल इफ़ेक्ट को दर्शाती हैं) ट्रिक फ़िल्म बनाई. यह फ़िल्म आने वाले समय में जादू और सिनेमा को मिलाकर बनाई जाने वाली फ़िल्मों के लिए नींव का पत्थर साबित हुई.

शुरुआती फ़िल्में
उनकी तेज़ रफ़्तार वाली फ़िल्मी दुनिया, आम दुनिया से अलग थी. उनकी इस दुनिया में शैतान, कंकाल और भूत-प्रेत थे, जो दर्शकों को डराने के साथ-साथ हँसाते भी थे. ये सभी किरदार एक खास सेट पर इस तरीके से फ़िल्माए जाते थे कि चीज़ों और किरदारों के आकार वगैरह वैसे ही दिखाई दें जैसे फ़िल्म बनाने वाला व्यक्ति उन्हें दिखाना चाहता है. इस तरीके को फ़ोर्स्ड-पर्सपेक्टिव सेट कहा जाता है. मेलियेस के दर्शक इन फ़िल्मों से रोमांचित होते थे. यही वजह थी कि वे बार-बार ऐसी फ़िल्में देखना चाहते थे.
मोन्त्रयी स्टूडियो
अपनी फ़िल्मों की सफ़लता के बाद, मेलियेस ने पेरिस के पास मोन्त्रयी में अपनी पारिवारिक ज़मीन पर एक फ़िल्म स्टूडियो बनाया. यह स्टूडियो बनाने में मेलियेस ने बहुत पैसा खर्च किया. इस स्टूडियो में कलाकारों के लिए ड्रेसिंग रूम, सेट का सामान रखने की जगह, तहखाने (ट्रैपडोर) और रोशनी को फ़िल्टर करने वाला सामान, सब कुछ मौजूद था. मेलियेस ने इस स्टूडियो का इस्तेमाल अपने फ़िल्मी सफ़र के आखिर तक किया.
खास फ़िल्में बनाने के लिए बनाया गया यह कांच का स्टूडियो, दुनिया में अपनी तरह का पहला स्टूडियो था. हालांकि आज, इस स्टूडियो का कोई नामोनिशान नहीं है. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस स्टूडियो को पूरी तरह से तोड़ दिया गया था.
ट्रिक फ़िल्में
सुपरइम्पोज़र (एक सीन के ऊपर दूसरा सीन लगाने की तकनीक), क्रॉस फ़ेडिंग (नया सीन आने से पहले पिछला सीन धुंधला होना), मोंटाज (फ़िल्म के अलग-अलग भागों को चुनना, एडिट करना और साथ जोड़कर पूरी फ़िल्म बनाना), काला बैकग्राउंड, स्लाइडर (कैमरे को इस तरह चलाना कि उसका अच्छा असर फ़िल्म पर पड़े) पर लिए जाने वाले क्लोज़-अप शॉट, थिएटर और पाईरोटेक्निक इफ़ेक्ट और भ्रम पैदा करने वाली तकनीकें…
द मैन विद द रबर हेड
मेलियेस सीन फ़िल्माने के लिए अलग-अलग तरीके ढूंढते रहते थे. उदाहरण के लिए, "L'Homme à la tête de caoutchouc" (द मैन विद द रबर हेड) फ़िल्म में उन्होंने कैमरा इफ़ेक्ट और पर्सपेक्टिव का अच्छा इस्तेमाल किया.
“रबर हेड” इफ़ेक्ट लाने के लिए, एक ट्रॉली को पटरी पर चलाया जाता था. कैमरे को एक जगह स्थिर रखकर, अभिनेता और ट्रॉली को कैमरे की तरफ़ ले जाया जाता था. जब वे लेंस की तरफ़ जाते थे तो उनका आकार “बड़ा” दिखाई देता था. इसी हिसाब से, कैमरे से दूर जाने पर उनका आकार छोटा दिखाई देता था.
ट्रिक फ़िल्मों की मदद से मेलियेस स्क्रीन पर ऐसे सीन दिखा पाते थे जिन्हें स्टेज पर दिखाना मुमकिन नहीं था: कटे-टुकड़े हुए या रौंदे शरीर दिखाना; व्यक्ति के जीवित रहते हुए सिर या हाथ-पैर अलग होते हुए दिखाना; एक ही चीज़ या व्यक्ति को एक-साथ दो जगह दिखाना, फ़्रेम में बाकी सभी चीज़ें एक जैसी रखते हुए किसी खास चीज़ या व्यक्ति को दोबारा फ़िल्माना, जिससे असलियत में शूट किए बिना वह वीडियो असली लगे (सब्स्टिटूशन स्प्लाइसेस), रूप बदलना (ट्रांस्फ़ॉर्मेशन), लोगों और चीज़ों को हवा में उड़ाना…
अ ट्रिप टू द मून
1902, मेलियेस के लिए सबसे कामयाब साल था क्योंकि इस साल उन्होंने अपनी सबसे मशहूर फ़िल्म "अ ट्रिप टू द मून" बनाई थी. इसके लिए उन्होंने कई लोगों और चीज़ों से प्रेरणा ली, जैसे जूल्स वर्न, एच. जी. वेल्स, मेले के झूले और ऑपरेटा.

यह फ़िल्म बनाने में उन्हें कई महीने लगे और साथ ही, ढेर सारे पैसों की ज़रूरत भी पड़ी. यह फ़िल्म 853 फ़ीट (लगभग 13 मिनट) लंबी थी और इसमें 30 सीन थे.

इसमें ऐसी कई शानदार और चौंका देने वाली तरकीबें थीं, जिन्हें पहले नहीं देखा गया था. इस फ़िल्म ने दुनिया में धूम मचा दी और शायद इसी वजह से, गैरकानूनी तरीके से इसकी कॉपी बनाकर बेची गई, खास तौर पर अमेरिका में. मेलियेस को अपने फ़िल्म के अधिकार बचाने के लिए अमेरिका में एक ब्रांच ऑफ़िस खोलना पड़ा.
करियर की रफ़्तार धीमी हो गई
साल 1908 में, मेलियेस ने 50 फ़िल्में बनाईं. यह उनके करियर का सबसे शानदार साल रहा. हालांकि, इसी समय मेलियेस के करियर की ढलान भी शुरू हो गई. 1912 में उन्होंने अपने जीवन की आखिरी 3 फ़िल्में बनाईं, जिनमें मशहूर फ़िल्म कंपनी Pathé ने पैसा लगाया था. ये सभी फ़िल्में फ़्लॉप रहीं. दर्शक कल्पना से भरी कहानियां नहीं देखना चाहते थे. अब आम ज़िंदगी से जुड़ी हुई, फ़ैयाद की फ़िल्में स्क्रीन पर अपनी धाक जमाने लगी थीं. अमेरिका में, डेविड डब्ल्यू ग्रिफ़िथ दुनिया भर के सिनेमा के लिए नया दौर शुरू कर रहे थे. पहला विश्वयुद्ध शुरू होने वाला था… जहां एक तरफ़ Pathé, Gaumont और Éclair जैसी फ़्रेंच फ़िल्म कंपनियां बड़े संस्थानों में बदल गईं, वहीं मेलियेस ने कभी भी अपनी छोटी सी कंपनी को किसी बड़ी संस्था में बदलना नहीं चाहा.
करियर की रफ़्तार धीमी हो गई
1923 में Pathé का कर्ज़ा उतारने में नाकामयाब रहे मेलियेस को अपना मोन्त्रयी का स्टूडियो बेचना पड़ा. पैसा कमाने के लिए, उन्होंने पेरिस के मोन्पारनास स्टेशन पर मिठाइयां और खिलौने बेचे. यहां एक पत्रकार ने उन्हें पहचाना और 1929 में उनके सम्मान में एक जश्न मनाया गया. 3 साल बाद, मेलियेस और उनकी पत्नी जिहैन डैल्से (जिनसे उन्होंने 1925 में शादी की थी) को ओरली स्थित सिनेमा सोसायटी के रिटायरमेंट होम में दाखिल करवा दिया गया. 21 जनवरी 1938 को पेरिस में उनकी मौत हो गई.
उनकी विरासत
मेलियेस ने उस समय अपनी फ़िल्मों में जिन तरकीबों को दिखाया, वे आज नए ज़माने के इफ़ेक्ट के रूप में डिजिटल तकनीक के ज़रिए पर्दे पर दिखाई जा रही हैं. हॉलीवुड के दिग्गज, मेलियेस को कभी नहीं भूले. वे मानते हैं कि मोन्त्रयी के इस जादूगर ने, फ़िल्मों की दुनिया में स्पेशल इफ़ेक्ट के नए आयाम खोले. 2011 में मार्टिन स्कॉरसेसी के निर्देशन में बनी फ़िल्म ह्यूगो के ज़रिए, हाल ही में मेलियेस को एक शानदार श्रद्धांजलि दी गई.
क्रेडिट: सभी मीडिया
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