1939 - 1989

इतिहास द्वारा अलग किए गए

Polish History Museum

"इतिहास द्वारा अलग किया गया" प्रोजेक्ट का लक्ष्य 20 वीं शताब्दी के सबसे अभिघातक पोलिस अनुभवों में से एक को दस्तावेज़ीकृत करना है – अन्य बातों के साथ-साथ, पुनर्वास और युद्ध अवधि का निर्वासन, राजनैतिक कारावास और राजनैतिक या आर्थिक कारणों से पश्चिम में प्रवास करने के लिए साम्यवादी युग में निर्णय लेने के कारण वर्ष 1939–1989 में परिवारों में अलगाव.

इसके कारण हम अलग हुए परिवारों की स्मृति को सहेजना, पोलेंड में घर में रहने वाले लोग और पोलिस प्रवासी के इतिहास के बीच संबंध स्थापित करना और नई पीढ़ी को उनके रिश्तेदारों या परिचितों के इतिहास में रूचि लेने के लिए प्रोत्साहित करना चाहेंगे.

प्रत्येक विवरण और कहानी अमूल्य है, क्योंकि किसी भी दो परिवार की कहानी एक जैसी नहीं है. सभी संरक्षित किए जाने योग्य है, क्योंकि वे 20 शताब्दी में पोलेंड और क्षेत्र के अन्य देशों के जीवन अनुभव और जटिलताओं के गहराई की साक्षी हैं.

नाज़ी जर्मनी के द्वारा अधिकृत क्षेत्र में रहने वाले हजारो पोलंड के वासी, जिन्हें सामूहिक फांसी, निर्वासन, संकेंद्रण शिविरों और बंधुआ मजदूरी के लिए कारावास दिया जाता था, में मिलकोवस्की परिवार भी शामिल था. मिलकोवस्की परिवार का इतिहास सबसे पहले एक हिंसा और हत्या का सामना कर रहे बच्चे की बेबसी की एक कहानी है. यह एक माता-पिता की कहानी भी है, जो अपनी ही बच्चों को विपदा और पीड़ा से बचा नहीं पाए.

मारिया, इरेना और ज़िग्मंट इमीवकोफ़्स्की की सबसे बड़ी बेटी, पोमेरानिया के गांव, प्लीनो में - अपने माता-पिता और भाई-बहन - हालिना, ज़ोफिया और ज़िबिगन्यो के साथ रहती थी. उसके नाना-नानी पास ही रहते था. अगस्त 1939 में, उनके पिता, ज़िग्मंट इमीवकोफ़्स्की ने सेना में कार्य करने के लिए घर छोड़ दिया. ज़िग्मंट ग्रोडनो की 29 वीं लाइट आर्टिलरी रेजिमेंट में लड़े, जहां से वह एक महीने की लंबी यात्रा के बाद घर लौटे.

इरेना और ज़िग्मंट इमीवकोफ़्स्की, 1937
मारिया ब्रिलोस्का (née Imiłkowska), 2009 द्वारा अनुस्मरण
प्लेनो को रीच के ग्डांस्क-पश्चिमी प्रुशिया राज्य में समाविष्ट किया गया था. मलिनोस्की के खेतों को जर्मन ने अपने अधीन कर लिया और उन्हें अपने ही पुराने घर के केवल एक कमरे में रहने के लिए छोड़ दिया.
मारिया के दादा, लियोन कोवाल्स्की को पोलिश पश्चिमी संघ, (जिसने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान एक सेना के रुप में युद्ध किया था) के एक कार्यकर्ता के रूप में जाना जाता था. पोलिश इलीट के कई प्रतिनिधियों की तरह उन्हें भी 1939 के पतझड़ में गिरफ़्तार कर एक फ़ायरिंग दस्ते द्वारा गोली मार दी गई और गोर्ना ग्रुपा (ग्रडज़िएज़) में दफ़ना दिया गया.

नाज़ियो की पोलिश और स्लाव भाषा बोलने वाले अन्य लोगों को अपकृष्ट जाति का दर्जा देकर गुलाम बनाने की योजना थी. उन्होंने सभी माध्यमिक और उच्च-स्तरीय शैक्षिक संस्थानों और यहां तक की सांस्कृतिक संस्थानों भी को बंद कर दिया था. पोलिश इलीट के सदस्यों को या तो मार दिया गया था या बंदी शिविर में भेज दिया गया था.

लियोन का प्रमाणीकरण कोवाल्स्की को 1927 में लीजन क्रॉस (पोलिश लीजन के सदस्यों के संघ का बैज) से सम्मानित किया गया

दिसंबर 1941 में, मलिनोस्की परिवार को पुल्टिश में स्थित एक कैम्प में निर्वासित कर दिया गया था. कैम्प की स्थिति बहुत दयनीय थी. वहां रहने वाले भूख, बिमारी और ठंड से पीड़ित थे. हालांकि इन सभी पीड़ाओं से अधिक दुखदायी था उन्हें एक दूसरे से अलग रहने पर बाध्य करना. पहले तो, मारिया के पिता को किसी विमान बनाने वाली फ़ैक्ट्री में काम करने के लिए भेज दिया गया. उसके बाद, उसकी गंभीर रूप से बीमार बहन, हलिना को ज़ाइगोटिक में स्थित एक अस्पताल में भेज दिया गया. हलिना इतनी कमज़ोर थी कि जब वह कैम्प में वापस लौटी तो उसे झड़ी के सहारे चलना पड़ता था. इन सभी परिस्थितियों में सबसे कठिन था मारिया का उसकी मां से अगल करना. उन्हें 1942 के वसंत में किसी ज़मीनदार के घर काम करने के लिए भेज दिया गया. एक महीने बाद, कैंप का कोई न्यासी ज़ोफ़िया और इज़्बिग्नीयस को ले गया. मारिया और हलिना अकेली रह गईं.

मलिनोस्की परिवार के कैम्प की संख्या 1941 में उनके पिता को जारी की गई
1941-1944 में, पुल्टिश कैम्प में बच्चों द्वारा एक गीत तैयार किया गया और गुप्त रुप से गाया गया

"उसके बाद वो हमें बैरक में ले गए. वो जगह गर्म नहीं थी और वहां ज्यादा भी भीड़ नहीं थी लेकिन वहां ठंड थी और अंधेरा था. छः लोगों के हमारे परिवार को रहने के लिए केवल तीन वर्ग मीटर का क्षेत्र दिया गया था. हम ज़मीन पर भूसा बिछाकर सोते थे; उस बैरक में कोई फ़र्श नहीं था. वहां दीवारों पर छेद और दरारें थीं और कमरे में खिड़कियां नहीं थीं. वहां की झुकी हुई छत लगभग ज़मीन को छू रही थी. वहां खड़ा होना और बैठना असंभव था; वहां बस कोई लेटे रह सकता था. इसलिए, सभी परिवार पुरुष, महिला और बच्चों के क्रम में एक दूसरे से बिलकुल सटकर लेटते थे. बैरक में पानी या शौचालय की व्यवस्था नहीं थी. शौचालय बाहर बने हुए थे. केवल बैरक के बीच में सीधा खड़ा रहकर चला जा सकता था.

शौच न जाने कारण बच्चे गीले हो जाते थे और दस्त से पीड़ित रहते थे; वहां नहाने या अंतर्वस्त्रों या कपड़ों को धोने की कोई व्यवस्था नहीं थी; वहां केवल जूं, पिस्सू और खुजली थी."

मारिया ब्राइलोवॉस्का (नी मलिनोस्की) द्वारा 2008 में लिखे गए वृतांत "ऐतिहासिक घटनाओं के परिणाम स्वरूप परिवार के सदस्यों का अलगाव" से
उस परिवार में मारिया की दादी, विक्टोरा कोवाल्स्का ही केवल एक ऐसी व्यक्ति थीं जो स्वतंत्र रहीं. अन्य पोलिश लोगों की तरह वे भी बंदी बनाई गई अपनी बेटी और पोते-पोतियों से मिलने और उन्हें सहारा देने के लिए कांटेदार तारों के रास्ते से होते हुए पुल्टिश कैम्प गईं.

"मिलने के दिनों में, कई लोग बंदी शिविर में अपने परिजनों और दोस्तों से मिलने आते थे. उस दौरान कांटेदार तारों के दोनों ओर भारी भीड़ रहती थी, लोग अपने परिचितों को ढूंढने के लिए एक दूसरे का नाम ज़ोर से पुकारते थे. सभी को अपनी आवाज़ वास्तव में सुनाई देने के लिए चीखना पड़ता था. कांटेदार तार से चिल्लाकर बात करते हुए सभी को देखकर ऐसा लगता था कि यह चीखने की एक महान प्रतियोगिता है. यह अवर्णनीय था."

मारिया ब्राइलोवॉस्का (नी मलिनोस्की) द्वारा 2008 में लिखे गए वृतांत "ऐतिहासिक घटनाओं के परिणाम स्वरूप परिवार के सदस्यों का अलगाव" से
मलिनोस्की बहनों के लिए सबसे कठिन समय उनका स्मुकला के शिविर में ठहरना था. वहां बच्चे भूख, बिमारी, और थकान से मर रहे थे. हालांकि, बहनें जीवित रहीं और पुल्टिश वापस आ गईं.
बेगारी व्यावसायिक दमन का एक स्वरुप और कृषि एवं उद्योग के लिए सस्ती मज़दूरी करवाने का एक तरीका था. मारिया के पिता को विमान की फ़ैक्ट्री में भेज दिया गया था, स्वयं उसे और उसकी मां को जर्मन भूसंपत्ति पर काम करने के लिए भेज दिया गया था. 1941-1945 में विमान फ़ैक्ट्री फ़्लगज्यूग्वर्क गोटेनहाफ़ेन में बेगारी के दौरान ज़िग्मंट मलिनोस्की (बाएं से तीसरा).
बेगारी करने वाले मज़दूरों को मिलने वाली मजदूरी जर्मन श्रमिकों से कहीं अधिक कम थी. फ़्लगज्यूग्वर्क गोटेनहाफ़ेन में कार्य करने के दौरान ज़िग्मेट मलिनोस्की द्वारा कमाया गया धन पुल्टिश में कैम्प के खाते में भेजा गया था लेकिन वास्तव में उन्हें कभी कोई वेतन मिला ही नहीं था. 1944 में ज़िग्मेट मलिनोस्की की श्रम श्रेणी अधिसूचना
मारिया को जर्मन भूसंपत्ति ओर्लोवो भेजा गया जहां उनसे बहुत मेहनत करवाई गई. रेड आर्मी आने के बाद उनकी दादी ने उन्हें ढ़ंढा और वापस प्लेनो ले आईं. उनकी मां घर पर पहले से प्रतिक्षा कर रही थीं. 1945 में ओर्लोवो भूसंपत्ति से मारिया मलिनोस्की का विपंजीकरण प्रमाणपत्र
ज़िग्मंड इमीवकोफ़्स्की को 1945 में गदीनिया से लियूबिंगन में स्थित शिविर में भेज दिया गया. इस शिविर में वे हवाई हमलों से बचे रहे और अप्रैल 1945 में हुए अमरीकी मुक्ति आंदोलन को भी देखा. वे गोस ग्रैफ़ेन्डोफ़ में रहे.
उस वर्ष जुलाई में ज़िग्मंड इमीवकोफ़्स्की मर्सबर्ग में ही थे. अपने निकटम संबंधियों के जीवित अवस्था में होने के बारे में कम जानकारी के बावजूद, उन्होंने कभी आशा नहीं छोड़ी और प्लेनो में अपने घर वापस जाने का निर्णय लिया.

"मुझे याद है, वह गर्मी का एक दिन था जब मेरे पिता घर आए थे. हम उन्हें पहचान नहीं पाए. वो झुके हुए थे और वैसे नहीं लग रहे थे जैसा हमने उन्हें 1941 की दिसंबर में अंतिम बार देखा था. वो किसी भिखारी की तरह दिख रहे थे. वो घर पर भूरे और हरे रंग की अमरीकी सेना की कोट पहनकर आए थे और इसके अलावा उनके पास सूटकेस में नीले और भूरे रंग का एक दूसरा कोट भी था. अमरीकी शिविर से वो बस यही लाए थे. हमारे परिचित, श्रीमान डोनज़िलो को हम युद्ध के पहले से जानते थे, वो पहले दर्जी का काम किया करते थे, उन्होंने इन सेना वाली कोटों से हम बच्चों के लिए कोट सिले."

मारिया ब्राइलोवॉस्का (नी मलिनोस्की) द्वारा 2008 में लिखे गए वृतांत "ऐतिहासिक घटनाओं के परिणाम स्वरूप परिवार के सदस्यों का अलगाव" से
1946 में, परिवार बड़ा हुआ – ज़िजिस्वाफ़ का जन्म हुआ, इमीवकोफ़्स्की परिवार का एकमात्र बच्चा जो युद्ध के अनुभव से अनिभिज्ञ रहा. 1949 में इमीवकोफ़्स्की बहनें (बाएं से) – मारिया, ज़ोफ़िया और हलिना अपने भाई ज़िजिस्वाफ़ के साथ
1950 के दशक में इरेना और ज़िग्मंट इमीवकोफ़्स्की

"मैं 12 साल की थी और पढ़-लिख नहीं सकती थी. (…) स्वंत्रता के लिए शिविर छोड़ने के बाद हमें कोई सहायता नहीं मिली. (…) लगभग वर्ष 1956 तक के यद्ध के बाद का समय हमारे लिए बहुत कठिन था और हमें कई प्रकार के बलिदान देने पड़े थे. लेकिन मैं खुश थी कि मैं अपनी माता-पिता और भाई-बहनों के साथ थी और स्कूल जा सकती थी."

मारिया ब्राइलोवॉस्का (नी मलिनोस्की) द्वारा 2008 में लिखे गए वृतांत "ऐतिहासिक घटनाओं के परिणाम स्वरूप परिवार के सदस्यों का अलगाव" से
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान अलग हुए इमीवकोफ़्स्की परिवार का मार्ग
म्विन्याक परिवार के इतिहास को सोवियत अधिग्रहण के अधीन पोलिश लोगों के अनुभवों का एक अच्छा उदाहरण कहा जा सकता है. युद्ध ने कज़िमियर्ज़ और उसकी पत्नी ज़ोफ़िया को हमेशा के लिए अलग कर दिया. विपरीत दिशाओं में जा रही रेलगाड़ियां उन्हें रुस की गहराई तक ले गईं और वर्ष 1945 उनके लिए कोई आशा लेकर नहीं आई. युद्ध के बाद साम्यवादी प्राधिकारियों के भय के कारण एंडर्स की सेना के साथ ग्रेट ब्रिटेन आया एक पोलिश पुलिसवाले का सोवियत संघ द्वारा गिरफ़्तार किए गए अपनी पत्नी और बेटों – वाल्देमर और जर्ज़ी से मिलना असंभव था.

कज़िमियर्ज़ म्विन्याक ने सीमा गार्ड के रुप में कार्य किया था और पुलिस अधिकारियों का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा किया था. उसकी भेंट 17 वर्षीय ज़ोफ़िया ब्लीड्श्टेयन से हुई जिससे उसने विल्नियस के संत जॉन नाम के गिरिजाघर में शादी कर ली. एक साल बाद ज़ोफ़िया ने अपने पहले बेटे वाल्देमर कज़िमियर्ज़ को और 1932 में दूसरे बेटे जर्ज़ी हेनरिक को जन्म दिया. कज़िमियर्ज़ की तरक्की की गई और उसे हवलदार बना दिया गया. उसे उसके परिवार सहित विल्नियस वोइवोडेशिप में स्थित क्रुज़ेनिएट्स भेज दिया गया. युद्ध प्रारंभ होने के समय वो वहीं रह रहे थे.

1920 के दशक में पुलिस की वर्दी में अपने मित्र जान नेजविच के साथ कज़िमियर्ज़ म्विन्याक.
ज़ोफ़िया और कज़िमियर्ज़ म्विन्याक - 1928 में उनके माता-पिता को क्रासोचिन में तस्वीर भेजी गई
क्रासोचिन में 1930 के दशक में अपने माता-पिता के साथ रहते समय अपनी पत्नी और बेटे वल्देमर के साथ कज़िमियर्ज़ म्विन्याक.

पोलैंड में रेड आर्मी के प्रवेश के बाद कज़िमियर्स की टुकड़ी को लिथवेनिया से जाने का आदेश दिया गया. जहां पुलिस अधिकारियों को तैनात किया गया था. यह सोवियत संघ द्वारा कज़िमियर्स की लंबी यात्रा का प्रारंभ था. कज़िमियर्स को पहले उत्तर में मूर्मंस्क भेजा गया. फिर बाद में पूरे कोला प्रायद्वीप से होते हुए आरंगेल्स्क भेजा गया.

1941 में कोजेल्स्क शिविर से कज़िमियर्स म्विन्याक द्वारा अपने माता-पिता को लिखा गया पत्र

17 सितंबर 1939 को लाल सेना ने पौलेंड पर पूर्व से चढ़ाई की. रिबेथौफ़-मोलोतोव संधि (हिटलर-स्टालिन संधि) ने गुप्त प्रोटोकोल में अनुबद्ध तीसरे राइक की ओर जाने की स्टालिन की बाध्यता को समाप्त किया. सोवियन संघ सरकार ने अधिग्रहित क्षेत्र में रह रहे 13,50,000 पोलिश नागरिकों को सोवित नागरिकता स्वीकार करने पर बाध्य किया. फरवरी 1940 से जून 1941 तक पोलिश नागरिकों को बड़ी संख्या में सोवियत के अंदरूनी हिस्सों में निर्वासित किया गया. इस निर्वासन ने अधिकारियों, नौकरशाहों, पुलिस, वकीलों, डॉक्टरों और पोलिश प्रबुद्ध वर्ग के अन्य प्रतिनिधियों के परिवारों को प्रभावित किया. इनमें से कई, साइबेरिया या कज़ाकिस्तान में अमानवीय परिस्थितियों वाले यातायात और वहां के कठोर जीवन को झेल नहीं पाए.

ज़ोफ़िया म्विन्याक द्वारा साइबेरिया से अपने ससुराल वालों को लिखा गया एक पत्र, जहां उन्हें अप्रैल 1940 में निर्वासित किया गया था. ज़ोफ़िया म्विन्याक ने आठ वर्ष के जर्ज़ी और 12 वर्ष के वाल्देमर के साथ अनेक रेलगाड़ियों में पूर्व में बहुत अंदर तक यात्रा की. वे पहले नोवोसिबर्स्क और फिर अल्ताई कराई के सामूहिक खेतों की ओर गए.

जून 1941 में सोवियत संघ पर नाज़ी जर्मनी के हमले के बाद निर्रवासित पोलिश सरकार और स्टालिन के बीच बातचित प्रारंभ किया गया. इसके आधार पर हज़ारों पोलिश नागरिकों को कैद और श्रम शिविरों से छुड़ाया गया. इस अनुबंध का पालन करते हुए सोवियत संघ में जनरल वादिस्वा एंडर्स के अधीन पोलिश सशस्त्र सेनाओं का गठन किया गया. बाद में, 1942 में, 74,000 असैनिक नागरिकों के साथ एंडर्स की 41,000 सिपाहियों की टुकड़ी और को मध्य पूर्व से खाली कराया गया.

1941 के पतझड़ में जब पोल्स को क्षमा करने की घोषणा की गई तब कज़िमियर्स ने स्वेक्षा से ततिस्चेव में गठित जनरल एंडर्स की पोलिश सेना में भर्ती होने का निर्णय लिया. अगले वर्ष मार्च में उसने सोवियत संघ को एक सैनिक के रूप में छोड़ा. सैन्य पुलिस दल में कार्य करते हुए कज़िमियर्स ने द्वितीय पोलिस कोर्प्स के साथ इराक, इरान, फ़िलिस्तीन, और मिस्र से इटली तक की यात्रा की.

1942 में, मध्य पूर्व में, पोलिश सशस्त्र सेना में कज़िमियर्स म्विन्याक

12 सितंबर 1942 में, मध्य पूर्व में, जनरल एंडर्स की सेना और 1941 में टोबर्क की प्रतिरक्षा के नायक कहे जाने वाले स्वतंत्र कार्पथियन ब्रिगेड से जुड़कर, पोलिश सशस्त्र सेनाओं का गठन हुआ. आरंभ में इनकी छावनी इराक में लगाई गई जहां टुकड़ी ने अपना स्वास्थ्य सुधारा. वर्ष 1943 में मित्र राष्ट्रों की इटली पर हमला करने की योजना के कारण इस सैन्य दल के अधिकांश सिपाहियों को फ़िलिस्तीन भेज दिया गया.

सैन्य पुलिस टुकड़ी में कार्य करते हुए द्वितीय पोलिश दल के साथ कज़िमियर्स म्विन्याक ने इराक, इरान, फ़िलिस्तीन और मिस्र से इटली तक की यात्रा की.

पोलिश सेना की सबसे बड़ी टुकड़ी द्वितीय पोलिश दल (II कोर्पस पोल्स्की) थी जिसमें अधिकांश टुकड़ियां जनरल एंडर्स की सेना की थी. इसने 1944 में इटली के युद्ध में भाग लिया था और मई 1944 में मोंटे कसिनो के युद्ध में कीर्ति प्राप्त की. बाद में इसने अंकोना और बोलोन्य को स्वतंत्रता दिलाई.

1944 में हमले के बाद पिडीमोंटे के एक छोटे से गांव का अवशेष (मोंटे कसिनो के पास)
युद्ध के बाद जनरल एंडर्स पश्चिमी मित्र राष्ट्रों और सोवियत संघ के बीच लड़ाई उम्मीद कर रहा था और सोवियत अधिग्रहण से देशों को मुक्त कराने की आशा में सैन्य बल तैयार की. 1946 के आरंभ में उनके पास 100,000 सिपाही थे. कज़िमियर्स म्विन्याक (बाएं से पहला), 1946 में इटली में सेना के लिए कार्य करते हुए.

फरवरी 1946 में, अंग्रेज़ी सरकार ने पोलिश शसस्त्र सेनाओं को समाप्त करने का निर्णय लिया. सितंबर में पोलिश पुनर्वास बल का गठन करने पर सहमति हुई. ऐसा सैन्यविघटन की प्रक्रिया को आसन बनाने के लिए किया गया था जिसके अनुसार सैनिकों को नागरिक जीवन की पर्याप्त तैयारी का अवसर किया गया. सैनिकों को पुराने सैन्य शिविरों से हटाकर अन्य जगहों पर भेज दिया गया था, उदाहरण के लिए, उन्हें फ़ॉक्स्ली भेज दिया गया. ये शिविर 1955 तक कार्यरत रहे.

1947 में, फ़ॉक्स्ली शिविर (ग्रेट ब्रिटेन) में कज़िमियर्स म्विन्याक. कुछ सैनिक पोलैंड लौट आए जहां उनका साम्यवादी प्राधिकारियों द्वारा दमन किया गया था. हालांकि अधिकांश को ब्रिटेन के प्रभूत्व वाले राज्यों में बसने का अधिकार मिल गया था और वे ग्रेट ब्रिटेन, कैनडा और ऑस्ट्रेलिया में बस गए.
कज़िमियर्स म्विन्याक को 1941 तक यह ज्ञात नहीं था कि उसकी पत्नी और बेटों को परिवारों के सामूहिक निर्वासन के दौरान अप्रैल 1940 में साइबेरिया भेज दिया गया था. उस समय कज़िमियर्स पोलिश सशस्त्र सेनाओं में कार्य कर रहा था और अपने परिवार को रूस से बाहर निकालने का प्रयास में था. 1943 में, कज़िमियर्स द्वारा बगदाद में अपनी पत्नी और बेटों के लिए पासपोर्ट प्राप्त किया गया.

युद्ध के बाद कज़िमियर्स म्विन्याक ग्रेट ब्रिटेन में बस गया और अपनी पत्नी और बेटों से मिलने का व्यर्थ प्रयत्न करने लगा. ज़ोफ़िया को बलपूर्वक एक सोवियत नागरिक बनाया गया जिसके कारण उसका सोवियत संघ छोड़कर अपने पति से मिलना असंभव हो गया.

इस दौरान, उसका परिवार डाक द्वारा पत्राचार और तस्वीरों के माध्यम से संपर्क में रहा. 1990 के दशक में, कज़िमियर्स से मिलने इंगलैड में उसकी पोती ओल्गा आई. ओल्गा कज़िमियर्स के सबसे बड़े बेटे वाल्देमर की बेटी थी.

1965 में, ज़ोफ़िया म्विन्याक अपने पोते-पोती ओल्गा औप विक्टोर के साथ
1957 में वाल्देमर म्विन्याक अपन पत्नी वाला के साथ
1987 में, लंदन में कज़िमियर्स म्विन्याक
वृतांत “मेरी आत्मकथा”. कज़िमियर्स म्विन्याक ने वर्ष 1939 में लुथियाना में स्थित रोकिस्ज़की के बंदी शिविर में अपनी आत्मकथा लिखना प्रारंभ किया लेकिन वह चुरा लिया गया. लेखक उसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंगलैंड में पुनः लिखने में सफल रहा. 1990 के आरंभिक दशक में, इसकी हस्तलिपि पोलैंड में उसके भाई विटालिस के पास थी.
अलग हुए म्विन्याक परिवार के रास्ते
स्वैजलर परिवार ने लंबे समय तक एक दूसरे से अलग रहने और युद्ध के दौरान अपने प्रिय एवं नज़दीकी लोगों की मृत्यु का अनुभव किया. फ़्रांस्सिक को जर्मन द्वारा बंदी बना लिया गया और युद्ध पूरे के दौरान वह ओफ़्लैग में रहा. पुनः मिलने और एक साथ जीवन व्यतीत करने की उनकी आशा, वारसॉ के विद्रोह में फ़्रांस्सिक की पत्नी और बेटे की मृत्यु के कारण समाप्त हो गई. उनका बिझड़ना युद्ध से भी लंबा चला. फ़्रांस्सिक को पोलैंड लौटने और अपनी जवान बेटियों से मिलने की अनुमति 1956 तक नहीं दी गई.

स्टेनिस्वावा और फ़्रांस्सिक स्वैजलर वूज में रहे, जहां उन्होंने सुखी पारिवारिक जीवनयापन किया. वह एक सफल वकील बना. स्टेनिस्वावा ने अपना समय अपने परिवार, सामाजिक जीवन और परोपकार के कार्य के बीच बांट लिया. प्रत्येक दिन, फ़्रांस्सिक और स्टेनिस्वावा अपने लगातार बढ़ रहे परिवार के साथ रात का खाना खाने के लिए एकत्रित होते थे. इस परिवार में उनका सबसे बड़ा बेटा ववूदेक, बारबरा और टेरेसा नाम की दो बेटियां, दादी एमीलिया लूटोमस्का और चाची एडेला, जिन्हें प्यार से लोग डेला कहते थे, शामिल थे. इसके अलावा व्यवसाय संघ के सचिव और कानूनी इंटर्न के साथ-साथ कई अन्य संबंधी और अतिथि थे.

2009 में टेरेसा राइबिका द्वारा स्मृति (नी स्वैजलर)

अगस्त 1939 में फ़्रांस्सिक स्वैजलर को पारिवारिक अवकाश के दौरान सेना में भर्ती के लिए बुलाया गया. वर्दी में तैयार अपने परिवार से अंतिम विदाई लेने वो पहुंचा, यह अंतिम बार था जब पूरा परिवार एक साथ था.

1939 के रक्षात्मक युद्ध में हार के कारण पोलिश सेना के लगभग 420,000 सैनिकों को जर्मन POW शिविरों में ले जाया गया. जहां अधिकारियों को ओफ़्लैग और निजी सैनिकों एवं अप्रमाणित अधिकारियों को स्टैलेग में ले जाया गया. फ़्रांस्सिक को नज़रबंद किया गया और उसने अपने अगले छः साल सैंडबोस्टल और ब्लूमर्ग में ग्रोस बोर्न में POW शिविरों में बिताया.

ये तस्वीरें स्टैनिस्वावा स्वैजलर और उसके बच्चे ववूदेक, बारबरा और टेरेसा की हैं, जब उन्होंने 1941 से 1944 तक पियोर्नो, वारसॉ और ग्वोफ़्नो में अधिग्रहण अवधि बिताया था. इनमें से कुछ तस्वीरें ओफ्लैग में उनके बंदी पिता फ़्रांस्सिक स्वैजलर को भेजी गई थीं.

अधिग्रहण के दौरान अपने परिवार की सहायता करने के लिए स्टैनिस्वावा स्वैजलर ने ऐसे छोटे-मोटे कारोबार किए जिनको करने की कड़ी मनाही थी. कई बार वो वूज में फ़्लैट से सामान लाती थी जो युद्ध के बाद अब तीसरे राइश की सीमाओं के अंदर पड़ता था और इसलिए अवैध रूप से सीमा पार करना बहुत खतरनाक था.

अधिकृत पोलिश क्षेत्रों के लिए सामान्य सरकार के शासन में जीवन में कई प्राकर के आदेश और प्रतिबंध थे. इस दौरान कर्फ़्यू लागू किया गया था, लोगों को रेडियो रखने की मनाही थी, ऐसी जगहों पर जाना मना था जहां “nur für Deutsche” लिखा हो और खाने का व्यापार करना निषिद्ध था. इन कानूनों का किसी भी रूप में उल्लंघन करने पर कठोरता से दंडित किया जाता था, यहां तक कि लोगों को गिरफ़्तार भी किया जा सकता था, जर्मनी में निर्वासित किया जा सकता था, सुधार शिविरों में भेजा जा सकता था या मृत्यु दंड तक दिया जा सकता था.

जर्मन अधिग्रहण अधीन जीवन. तस्करी और अवैध रूप से सीमा पार करना

"उसके लिए हमारे बढ़ रहे समूह को खिलाना आसान नहीं था! वहां सिगरेट की एक दुकान थी, जहां उन्हें कुछ सिगरेट बेचने पर थोड़ी छुट मिलती थी. साथ-ही-साथ हमारे घर पर ही 'स्वयं-निर्मित' सिगरेट बनाया जाता था. मेरे छोटे हाथ इस कार्य के लिए सबसे उपयुक्त थे क्योंकि मैं कागज़ में तंबाकू भरने में सबसे तेज़ थी. (…) मां और बसिया अर्गंडी (जड़ाऊ पिन, बाल में लगाने वाले क्लिप) से फूलों की मालाएं बनाती थीं और एक साथ मिलकर हम सूत के झोले बुनते थे. ववोदेक, घड़ी और इलेक्ट्रिक का सामान ठीक करते थे और सूत से जूता बुनते थे, वो बहुत कुशल व्यक्ति थे."

2007 में टेरेसा रेबेका (नी स्वैजलर) द्वारा वृतांत "मेरी मां" से
1941-1943 में बिक्री के लिए झोला बनाते हुए टेरेसा और बारबरा स्वैजलर
पूरे युद्ध के दौरान प्रेम, सहानुभूति और सांत्वना भरे पत्र ओफ़्लैग और वारसॉ के बीच बांटे गए. दूर रहकर ही फ़्रांस्सिक अपनी पत्नी स्टैनिस्वावा की समर्थन दिया और अपने बच्चों की परवरिश में सहायता की. इस बीच उसके परिवार ने उसके लिए प्रसन्नता भरे पत्र भेजे जिसमें अधिकृत वारसॉ में जीवन की कठोरता के बारे में एक शब्द तक नहीं लिखा गया था.
युद्ध कैदियों द्वारा अपने परिवार के साथ पत्राचार करना केवल विशेष पत्र या केवल पेंसिल से लिखे गए पोस्ट-कार्ड के माध्यम से संभव था क्योंकि उनकी जांच सेंसर द्वारा की जाती थी.

करीबी लोगों और प्रियजनों की दुःखद मृत्यु.

1944 में बारबरा और टेरेसा ने अपनी छुट्टियां अपने माता-पिता के कुछ मित्रों के साथ ग्वोफ़्नो में बिताया. वे वारसॉ कभी नहीं लौटे. उनके पास उनकी मां, भाई और डेला की मृत्यु का समाचार पहुंचा, जिन्हें वारसॉ में सार्वजनिक संहार में गोली मार दी गई थी.

युद्ध की समाप्ति के बाद भी परिवार मिल नहीं पाया. पोलैंड में नए साम्यवादी प्राधिकार द्वारा विरोधी भावना रखने वाले (सभी वैकल्पिक राजनैतिक विकल्पों के समान) रूढ़िवादी राष्ट्रीय दल में अपने पद पर रहकर पूर्व-युद्ध राजनैतिक गतिविधि के कारण प्रतिघात के भय से फ़्रांस्सिक स्वैजलर पोलैंड वापस नहीं जा सका.

पश्चिम में पोलिश शसस्त्र सेना की वर्दी में फ़्रांस्सिक स्वैजलर.

युद्ध के बाद फ़्रांस्सिक जर्मनी में ही रहा. बाद में वह न्यू योर्क चला गया लेकिन उससे पहले अपनी बेटियों से मिलने के कारण कुछ समय के लिए पोलैंड की यात्रा की. फिर भी वह वर्ष 1956 में जाकर पोलैंड में वयस्क हो चुकी अपनी बेटियों के पास लौट पाया.

इन वर्षों के दौरान, प्रेम, प्रोत्साहन और आकांक्षा से भरे पत्रों के माध्यम से फ़्रांस्सिक अपनी बेटियों के प्रति स्नेह और अपनी चिंता प्रकट करता रहा, जैसा उसने युद्ध के दौरान किया था.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद अलग हुए स्वैजलर परिवार के मार्ग
यह उन दो लोगों का इतिहास है जो अलग-अलग रास्तों से इंग्लैंड आए थे, जहां वे मिले, शादी की और एक परिवार बनाया. युद्ध के दौरान उनके रास्ते एक दूसरे से कभी नहीं टकराए. एक ने जर्मन अधिग्रहण और दूसरे ने सोवियत अधिग्रहण के अधीन इसे अलग-अलग जगहों पर रहकर सहा.
जूलियन स्ट्राइजैक, वूज के राज्य में स्थित ओशेडीन नाम के एक कस्बे में पैदा और बड़ा हुआ था. उच्च-विद्यालय से स्नातक करने के बाद वो लविव चला गया, जहां उसने एक शिक्षक के रूप में कार्य किया.
1936 में उसने इरेना सिज़वेका से शादी की, जिससे वह लविव में मिला. इरेना भी एक शिक्षिका थी. दो वर्षों बाद जुलियन मनोविज्ञान की पढ़ाई करने लगा. जब युद्ध प्रारंभ हुआ तब तक उसने अपनी पढ़ाई का पहला वर्ष सफलतापूर्वक पूरा कर लिया था.
अगस्त 1939 के अंत में, जुलियन स्ट्राइजैक को सेना में भर्ती होने के लिए बुलाया गया. 1 सितंबर को युद्ध के लिए जुलियन की टुकड़ी के रवाना होने के कारण उसे विदा करने आई अपनी पत्नी से वह अंतिम बार मिला.

1 सितंबर 1939 को जर्मनी ने पोलैंड पर पूर्व, पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम से हमला किया. दृढ़ता से सामना करने पर भी पोलिश सेना कई अधिक संख्या वाली बेहतर शसस्त्र जर्मन सेना को रोक पाने में सफल नहीं हो पाई.

जुलियन ने प्वास्क के करीब युद्ध कर रही 19 वी थल सेना रेजिमेंट में भारी मशीन गन वाली पलटन का नेतृत्व किया. वह तोप की गोलाबारी के दौरान घायल हो गया और उसे अस्पताल भेज दिया गया.
1939 में, बराउंजवाइक में ओफ़्लैग XI B के जर्मन POW शिविर में जुलियन स्ट्राइजैक 1939 के रक्षात्मक युद्ध में हार के परिणामस्वरूप पोलैंड गणराज्य की पोलिश सेना के लगभग 420,000 सैनिकों को जर्मन POW शिविर में ले जाया गया. जहां अफ़सरों को ओफ़्लैग और निजी सैनिकों एवं गैर-प्रमाणित अफ़सरों को स्टैलैग में भेज दिया गया.

जुलियन स्ट्राइजैक ने जर्मन POW शिविरों में छः वर्ष बिताए. कैद में उसे यह ज्ञात हुआ कि उसकी पत्नी को सोवियत रूस में निर्वासित कर दिया गया. वह अपनी पत्नी से संपर्क करने का प्रयास करता रहा. हालांकि उसे रोज़िन्यातोवो (अधिकृत पोलैंड) में रह रहे अपने चचेरे भाई से पत्राचार के कारण अपनी पत्नी से सीधा संपर्क करने में थोड़ी सफलता मिली. उसकी पत्नी से संबंधित उसके लिए एक सूचना थी.

1941 में, सोवियत संघ में निर्वासन के समय इरेना स्ट्राइजैक द्वारा अधिकृत पोलैंड में अपने पति के चचेरे भाई को भेजा गया पत्र
1944 में, जुलियन स्ट्राइजैक द्वारा टैंगरहट स्टैलैग के युद्ध क्षेत्र पर बने अस्पताल से पोलैंड में अपने परिवार को भेजा गया पत्र
वर्ष 1942 में इरेना स्ट्राइजैक के पत्र आने बंद हो गए. 1942 में कहीं दूर गुज़र में उसकी मृत्यु हो गई लेकिन जुलियन को यह बात युद्ध के बाद चली. तब तक वह अपनी पत्नी को मध्य पूर्व में ढूंढने का प्रयास करता रहा.
युद्ध के बाद हज़ारों लोगों को अपने करीबी और प्रियजनों की जानकारी कोई जानकारी नहीं थी. नागरिक सेना और सैनिक संगठनों ने उन्हें ढूंढकर परिवारों को पुनः मिलाने में सहायता की. पोलिश नागरिकों को इस प्रकार की सहायता प्रदान करने में पोलिश रेड क्रॉस सबसे आगे था.

1945 में, गोर्लिट्ज़ में, POW शिविर के खाली होते समय जुलियन भागने में सफल रहा. वो बोयेमिया के रास्ते जर्मनी से फ़्रांस आ गया, जहां वो पोलिश सेना में भर्ती हो गया.

1946 में, लौर्डेस तक अपन यात्रा के दौरान जुलियन स्ट्राइजैक (दाएं से दूसरा)
1946 में, फ़्रांस में, ला कोर्टाइन में, पोलिश सेना शिविर पर जुलियन स्ट्राइजैक
1946 में, जुलियन स्ट्राइजैक की सेन्य सेवा का दस्तावेज़ीकरण करने वाली सेवा रिकॉर्ड पुस्तिका
1949 में, पोलिश पुनर्वास दलों के विघटन के संबंध में सैन्य सेवा की समाप्ति
1949 में, इंग्लैंड में स्थित फ़ॉक्स्ली शिविर में, जुलियन स्ट्राइजैक. सैन्य-विघटन के बाद वह एक घड़ी बनाने वाले के रूप में कार्य करने लगा और मैनचेस्टर में बस गया, जहां उसने अपना नया परिवार शुरू किया...
हिलारिया बोरोवास्का बियाविश्टॉक में पैदा और बड़ी हुई. माध्यमिक स्कूल से स्नातक करने के बाद वो एक लिपिक के पद पर कार्य करने लगी. युद्ध प्रारंभ होने के समय वह 26 वर्ष की थी.

1941 में हिलारिया बोरोवास्का, उसकी मां और भाई टैडेयूज़ को साइबेरिया में अलग-अलग मार्गों से निर्वासित किया गया. बियाविश्टॉक में केवल उसके पिता, विंसेंटी, और उनकी देखभाल करने वाली उसकी छोटी बहन रह गए.

1942 में हिलारिया पाह्लेवी (इरान) पहुंच गई और जनरल एंडर्स की पोलिश सेना में भर्ती हो गई, जहां उसने क्वाटर मास्टर के पद पर कार्य किया.
1943-1944 में, एंडर्स की सेना में महिलाओं की सहायक सेवा में हिलारिया बोरोवास्का (बाईं ओर की पंक्ति में तीसरी)

सोवियत संघ में एंडर्स की पोलिश शसस्त्र सेनाओं के साथ-साथ महिलाओं की सहायक सेवा का गठन किया गया. यह सेना के समान ही संगठनात्मक सिद्धांतों और पदानुक्रमों पर आधारित था. इसमें पांच हज़ार स्वयं सेवी, प्राथमिक उपचार, संस्कृति, प्रचार, परिवहन, प्रशासन, पहरेदारी और संचार से संबंधित कार्य करते थे. 1946 में इसे भंग कर दिया गया था.

हिलारिया बोरोवास्का ने एंडर्स की सेना के साथ तेहरान की यात्रा की, जहां वह अपने भाई टाडेवेज़ से मिली. अपने भाई से वो 1941 में उनकी गिरफ़्तारी के बाद से नहीं मिली थी. फरवरी 1944 में, टाडेवेज़ ने जनिना मार्ज़ेवस्का से कराची में शादी की और पहले दर-ए-सलाम और फिर बाद में किगोमा जैसे अफ़्रीकी शिविरों में साथ-साथ गए. मई 1945 में हृदय खराब होने के कारण टाडेवेज़ की मृत्यु के बाद उसकी छः महीने की बेटी बारबरा अकेली रह गई.

1947 के पतझड़ में, हिलारिया "एम्प्रेस ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया" समुद्र के रास्ते इंग्लैंड आई.

वर्ष 1947 में, विटली में, पोलिश पुनर्वास दल के शिविर में, हिलारिया बोरोवस्का, अगली पंक्ति में बाएं से दूसरी
1949 में, ट्राफ़्लगर स्क्वैर में हिलारिया बोरोवस्का
हिलारिया बोरोवस्का और जुलियन स्ट्राइजैक परिचितों के माध्यम से मिले, शादी की और मैनचेस्टर में बस गए. 1950 में अपनी शादी के दिन.
1957 में, हिलारिया और जुलियन स्ट्राइजैक अपने बच्चे एंड्रज़ेज और बारबरा के साथ

1971 स्ट्राइजैक परिवार 1971 में युद्ध के बाद 30 वर्षों के अंतराल पर पहली बार पोलैंड वापस आया और हिलारिया ने अपने पारिवारिक घर की चौखट पार की.

हिलारिया और जुलियन स्ट्राइकर की बेटी बारबरा द्वारा द्ववितीय विश्व युद्ध के दौरान अपने माता-पिता का अंत स्मरण अंत स्मरण करना.
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मध्य पूर्व में हिलारिया स्ट्राइजैक (नी बोरोवस्का) द्वारा अपनाए गए मार्ग के बारे में उसने अपनी बेटी को एक पत्र भेजा, जो अपनी मां को फिर से ढूंढते हुए उनके पीछे-पीछे मध्य पूर्व जाने वाली थी.

"मैं तुम्हारी यात्रा के लिए एक मानचित्र भेज रही हूं ताकि तुम्हें रास्ते का अनुमान मिल जाए. अप्रैल के प्रारंभ में हम तेहरान से अह्वाज़ तक (सौ सुरंगों से अधिक) रेलगाड़ी में आए; उसके बाद अह्वाज़ से हम बसरा तक कार से आए; बसरा से एक बहुत छोटी रेलगाड़ी (बहुत छोटे डिब्बों वाली गाड़ी) से आगे गए. हर जगह गर्म और धूल भरी आंधी थी; एक हाथ की दूरी तक घुमावदार और भीषण लाल रेगिस्तान की धूल के अलावा कोई कुछ भी नहीं देख सकता था. हमें कार से बगदाद से येरुसलेम पहुंचने में चार दिन लगे. वहां रेगिस्तान और काले पत्थरों के अलावा एक घास की पत्ती तक नहीं थी. फ़िलिस्तीन की सीमा पार करने के बाद ही हमें खेत दिखाई दिए. अप्रैल के महीने में वहां पहले से बहुत गर्मी थी; मैने स्कर्ट, पोपलिन की शर्ट और छोटी बांह वाला हल्का सूती कपड़ा पहना हुआ था."

29 अप्रैल 1975 को हिलारिया स्ट्राइजैक द्वारा अपनी बेटी बारबरा को लिखा गया पत्र
1987 में बर्लिन की दीवार के सामने बारबरा स्ट्राइजैक अपने माता-पिता के साथ
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद अलग हुए स्ट्राइजैक परिवार के मार्ग
आभार: कहानी

The Polish History Museum in Warsaw expresses its sincere appreciation for their kind and helpful involvement in the project to — Maria Brylowska, Teresa Rybicka, Barbara Stryjak
Curation — Ewa Wójcicka, Polish History Museum
Proofreading — Barbara Stryjak, Tomasz Wiścicki
IT support — Artur Szymański
Exhibit's origin  — the presentation is part of the “Families Separated by History” project run by the Polish History Museum, rodziny.muzhp.pl

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