1914 - 2000

Jan Karski. Humanity's Hero®

Polish History Museum

"मैं एक छोटा मामूली आदमी था. मेरा मिशन महत्वपूर्ण था.”
क्लॉड लैन्ज़मैन के साथा अपने साक्षात्कार में जैन कार्स्की / 1978

जुलाई 1942 में, जर्मन नाज़ी ने अधिकृत वॉरसॉ से ट्रेब्लिंका मृत्यु शिविर में यहूदियों को सामूहिक रूप से ले जाना आरंभ किया. जैन कार्स्की, एक युवा राजनयिक-बने-दूत, ने पोलिश गुप्त संगठन के लिए एक अत्यंत प्रभावी महत्व रखने वाला मिशन लिया. वह पोलैंड के यहूदी लोगों के विनाश के एक चश्मदीद गवाह की रिपोर्ट स्वतंत्र दुनिया के सामने ले कर आए. वे दो बार वॉरसॉ यहूदी बस्ती में गए और बाद में इज़्बिका लूबेल्स्का ट्रांसिट शिविर में.

कई बाधाओं का सामना करते हुए, एक से अधिक झूठी पहचान का उपयोग करके, कार्स्की नवंबर के अंत में लंदन पहुंचे. वहां उन्होंने लंदन-आधारित देशनिकाला पोलिस सरकार के लिए विस्तारित लिखित रिपोर्ट तैयार की और उसके बारे में ब्रिटिश विदेश सचिव एंथनी एडेन को जानकारी दी. उन्हें तब वॉशिंगटन भेजा गया जहां वह ओवल कार्यालय में एक घंटे राष्ट्रपति फ़्रैंक्लिन डी. रूज़वेल्ट से मिले.

जिस समय कार्स्की इसका संकेत दे रहे थे, पोलैंड के अधिकांश यहूदी नागरिक पहले ही मारे जा चुके थे. लेकिन बचे हुए कुछ को बचाने का अभी भी समय था.

कार्स्की, जो 86 वर्ष की आयु तक जीवित थे, स्वतंत्र दुनिका की अक्रियता को मानवता का “दूसरा मूल पाप” मानते थे. उनकी रिकॉर्ड की गई गवाही, युद्ध और भेदभाव और अवक्रमण, अन्याय और क्रूरता – राजनीतिक हत्या और नरसंहार की पूर्वदशाओं जैसे कृत्यों का सामना करने पर कार्रवाई के आदेशों के विरुद्ध सबसे अर्थपूर्ण कथन रही.

लॉड्ज़ का औद्योगिक बहु-सांस्कृतिक शहर जैन कार्स्की का जन्मस्थान था (जन्म के समय दिया गया नाम: कोज़ील्युस्की).

तेज़ी से बढ़ते कपड़े उद्योग की राजधानी – नई सदी के परिवर्तन के साथ विविध राष्ट्रीयताओं और धर्मों के लोगों के लिए “खुशहाल राज्य” — के रूप में आगे बढ़ते हुए, कार्स्की ने युवा रहते हुए सहनशीलता और सहयोग के सबक सीख लिए.

1918 में लॉड्ज़ स्टूडियो में कोज़ील्युस्की परिवार की ली गई फ़ोटो – वह वर्ष जब पोलैंड ने विभाजन और विदेशी शासन के 130 वर्षों के बाद अपनी स्वतंत्रता प्राप्त की.
जैन कार्स्की अपने बड़े भाई एडमंड के साथ, 1922.

कार्स्की के रोमन कैथोलिक परिवार, यहूदी परिवारों के साथ एक किराए के घर में रहते थे; कार्स्की की धर्मनिष्ठ मां अक्सर उन्हें युवा यहूदी बच्चों के साथ रहना याद दिलाती रहती थी. 

कार्स्की का सबसे बड़ा भाई, मरियन कोज़िल्युस्की मार्शल पिल्सुड्सकी की सेना में शामिल हुआ और उनका 1918 में राष्ट्रीय स्वतंत्रता के लिए पिल्सुड्सकी के सफल आंदोलन में हाथ था. फ़ोटो में कार्स्की के भाई-बहन: बाएं से साइप्रायन, लौरा और मरियन.

कार्स्की का शुरुआती जीवन बहुत सादगीपूर्ण था. उनके पिता, स्टेफ़ान कोज़ील्युस्की, चमड़े का काम करते और शिल्पकार थे, जिनकी मृत्यु तब हुई जब कार्स्की 6 वर्ष के थे. वह मरियन थे, कार्स्की के सबसे बड़े भाई, जो युवा कार्स्की के पिता बने. कार्स्की की मां वॉलेनटीना और उनके भाई मरियन दोनों ने उन्हें उस पीढ़ी के लिए प्रबल आदर्शवाद की शिक्षा दी, जहां भगवान, सम्मान और जन्मभूमि को उन तीन बुनियादों के रूप में माना जाता था, जिनपर दूसरा गणराज्य स्थापित था. 

परिवार की विरासत, जन्मसिद्ध प्रतिभा और अंतर-युद्ध पोलैंड में उनके भाई मरियन का अनुकूल पद, कार्स्की के किशोरावस्था को परिभाषित करता है. उन्होंने विश्वविद्यालय से सफलता के साथ स्नातक किया, राजनयिक बनने का उनका सपना साकार होने के निकट था. 
कार्स्की ने 1935 में लवोव की जैन काज़ीमिएर्ज़ विश्वविद्यालय से कानून और राजनैतिक अध्ययन में अपना स्नातकोत्तर कला विशारद किया.

कई वर्षों के बाद, कार्स्की ने माना कि उनकी आकांक्षा उन कारणों में से एक थी जिसके कारण वे विश्वविद्यालय में यहूदी छात्रों पर अत्याचार करने के विरुद्ध खड़े होने में विफल हो गए. कार्स्की कोई चोट लगने से डर गए.

पोलैंड सहित संपूर्ण यूरोप के राष्ट्रवादियों में बड़े पैमाने पर यहूदी-विरोध भावनाएं चल रही थी और यहूदियों पर अत्याचार करने के विभिन्न तरीके अपनाए गए थे.

जैन कार्स्की और नए वर्ष के अवसर पर उनकी साथी 1938-‘39, वॉरसॉ.

1936 में, कार्स्की ने विदेश मंत्रालय में कार्य करना आरंभ किया. उस नौकरी ने उनके लिए वॉरसॉ के बड़े लोगों के दरवाज़े खोल दिए. बाद में, उन्होंने एक से अधिक वर्ष विदेश में व्यतीत किया, जिसमें जिनेवा और लंदन में राजनयिक पदों पर होना शामिल था.

23 अगस्त, 1939 की रात, कार्स्की ने एक गुप्त संघटन बनाने का आदेश प्राप्त किया, जिसने उनके किशोरावस्था के सपने का अंत कर दिया.  

कार्स्की ने ई. थॉमस वुड के साथ एक साक्षात्कार में संगठन बनाने और युद्ध होने के बाद का माहौल याद किया. 
1 सितंबर, 1939 को युद्ध आरंभ हुआ.  सुबह 5 बजे जर्मन के विमानों ने ओस्विएसिम में बम गिराए, जहां कार्स्की की टुकड़ी तैनात थी. कुछ घंटे बाद, सेकंड लेफ्टिनेंट और उनकी बटालियन पूर्व में पीछे हट रही थी. 
जर्मन सैनिक, जर्मन सोवियत सीमांकन लाइन पर एक सीमा चौकी चिह्नित करते हुए.

23 अगस्त, 1939 को मॉस्को में गुप्त जर्मन-सोवियत अनाक्रमण संधि पर हस्ताक्षर किए गए, जिसने पूर्वी यूरोप को जर्मन और सोवियत प्रभावी क्षेत्रों में विभाजित कर दिया. एक गुप्त प्रोटोकॉल ने राष्ट्रों के विभाजन के लिए नियम निर्धारित किए, जिसमें पोलैंड, लिथुआनिया, लातविया, एस्टोनिया, फिनलैंड और रोमानिया शामिल हैं. इस संधि ने पूर्व से पोलैंड पर सोवियत आक्रमण के लिए मंच तैयार किया, जबकि देश हिटलर की सेना के साथ एक हारी हुई जंग लड़ रहा था.

मोलोटोव-रिबेनट्रोप संधि (नाज़ी-सोवियत संधि) ने पूर्व से पोलैंड पर सोवियत आक्रमण के लिए मंच तैयार किया जबकि पोलैंडवासी हिटलर की सेना के साथ जंग लड़ रहे थे.

"शर्म और अपमान [की भावना से हम पूर्णतया पराजित हो चुके थे]. यह सब इतना शीघ्र हुआ. पूरा देश तैयार नहीं था.”

1995 में जैन कार्स्की ने पत्रकार मासिएज विएरज़िन्स्की को बताया.
कार्स्की ने ई. थॉमस वुड के साथ अपने साक्षात्कार में पोलैंड की शक्ति पर अपने पूर्वानुमान की विफलता को याद किया. 
सोवियत लाल सेना द्वारा बंदी बनाए गए कार्स्की, काटिन वन नरसंहार से बाल बाल बचे.

17 सितंबर, 1939 को सोवियत सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया. कार्स्की और उनकी बटालियम तार्नोपोल, यूक्रेन की ओर आगे बढ़ रहे थे, जब उन्होंने लाल सेना का सामना किया. सोवियत ने सहयोग का वचन दिया लेकिन अंत में पोलैंडवासियों को युद्ध बंदी बना लिया और उन्हें कोज़िएल्स, रूस में शिविर में भेज दिया.

अधिकारियों के साथ अधीनस्थ सैन्य पदाधिकारी की तुलना में और बुरा व्यवहार किया गया. जब जर्मन और रूसियों ने युद्ध के बंदियों के विनिमय की घोषणा की, तब उनके सख्त नियम थे – केवल साधारण सैनिक भाग ले सकते थे. बिना झिझक के, कार्स्की ने अपनी अधिकारी पोशाक एक अधीनस्थ सैन्य पदाधिकारी से बदल ली, यह दावा करके कि वह लोड्ज़ से एक फ़ैक्ट्री के कर्मी हैं. इस छल ने उनके जीवन की रक्षा की. पीछे रह गए शेष पोलिश अधिकारियों की स्मोलेन्स्क (काटिन, रूस) के निकट काटिन वन में एकसाथ हत्या कर दी गई, जो कि युद्ध के सबसे घृणित अपराधों में से एक था.

कार्स्की चलती हुई ट्रेन से कूद कर जर्मन की कैद से भाग निकले. वह वॉरसॉ चल कर पहुंचे. अधिकांश प्रतिभाशाली और देशभक्त पोलैंडवासियों की तरह, कार्स्की तुरंत पोलिस गुप्त संगठन में शामिल हो गए, जो अधिकृत यूरोप में सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली युद्ध-समय का प्रतिरोध आंदोलन था .

पोलिश की देशनिकाला सरकार को दी गई अपनी रिपोर्ट में, कार्स्की ने न केवल राजनीतिक दृश्य बयान किया, बल्कि अधिभोगियों के प्रति आम नागरिकों का भाव भी बताया – पोलैंडवासियों का लड़ने का जोश.

कार्स्की ने पोलिश गुप्त संगठन के लिए अपना कार्य देर 1939 में आरंभ किया, उनकी तीव्र बुद्धिमता और बेहतरीन स्मृति के कारण वे पोलिश देशनिकाला सरकार और गुप्त संगठन के बीच चुनें हुए कई दूतों में से एक थे. 1940 में अपने पहले मिशन के दौरान, उन्होंने अधिकृत पोलैंड की स्थिति के बारे में पोलिश सरकार को, फिर एंगर्स, फ़्रांस को प्रस्तुत की. वह गुप्त संगठन के नेताओं के लिए सरकार के संगठनात्मक दिशानिर्देशों के साथ वापस आए थे. कार्स्की ने महत्वपूर्ण जानकारी याद कर ली और अपने गंतव्य पर पहुंच कर उसे सुना कर रिपोर्ट दी.

एक से अधिक नकली पहचानों का उपयोग करके, परिवहन माध्यम और चालाकी से, अपना जीवन जोखिम में डाल कर, कार्स्की ने पोलिश गुप्त दूत के रूप में चार मिशन लिए: मिशन सं. 1 और 2. 1940 - पीली रेखा वॉरसॉ-एंगर्स-वॉरसॉ; मिशन सं. 3. 1940 - नीली रेखा वॉरसॉ-एंगर्स, डेमजाटा, स्लोवाकिया में समाप्त; मिशन सं. 4. 1942 - लाल रेखा वॉरसॉ-लंदन, ब्रुसेल, पेरिस, परपिग्नान, बार्सेलोना, मैड्रिड, जिब्राल्टार से होते हुए.
1940 में एंगर्स फ़्रांस में पोलिश देशनिकाला सरकार के अपने पहले मिशन पर, कार्स्की को कार्यरत रहते हुए पोलैंड की सामान्य स्थिति की रिपोर्ट करने का कार्य दिया गया. उस समय, उन्होंने पोलिश प्राधिकरण को पोलिश यहूदियों की गंभीर स्थिति के बारे में सतर्क किया.
आधिकारिक नाज़ी-घोषणाएं दैनिक जीवन पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए पोलिश नागरिकों को आतंकित करने के लिए थीं.

कार्स्की ने पोलिश देशनिकाला सरकार को स्थिति की विस्तृत रिपोर्ट दी. जर्मन-नाज़ी व्यवसाय के अंतर्गत, पोलिश नागरिकों ने न केवल गुप्त प्रतिरोधी संगठन में अपनी सदस्यता होने के कारण बल्कि अपनी दैनिक कार्य के कारण भी पकड़े जाने और हत्या किए जाने का सामना किया. अनिवार्य खाद्य की पूर्ति सीमित करने का अर्थ है भूखमरी. काले बाज़ार ने रोज़मर्रा के सामानों को उन लोगों के लिए उपलब्ध कराया जिनके पास अभी भी पैसे थे.

अधिकृत करने वालों ने न केवल पोलिश नागरिकों के मनोबल को खोखला करने का प्रयास किया, बल्कि पोलिश राष्ट्र को सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर कर दिया. उच्चतर शिक्षा वाली सभी संस्थाएं बंद कर दी गई थीं, पोलिश भाषा में शिक्षा पर रोक लगा दी गई थी और ऐसा करने का दंड मृत्यु था. दैनिक आधार पर संपत्ति जब्त की जा रही थी. फलस्वरूप, कार्यरत जीवन का अर्थ यादृच्छिक दौरे और फांसी का निरंतर भय, नए नाज़ी नियमों का उल्लंघन और बदला और बाद में मृत्यु था.

एंगर्स, फ़्रांस में पोलिश देशनिकाला सरकार ने जैन कार्स्की को पोलिश गुप्त संगठन, जिम्मेदारी और संवाद प्रभाग की ड्राफ़्ट संरचना याद करने का कार्य सौंपा गया. दूत कार्स्की ने संपूर्ण धारण को अधिकृत पोलैंड के राजनीतिक नेताओं को प्रेषित किया. इन निर्देशों के आधार पर, युद्ध के समय यूरोप में सबसे प्रभावशाली प्रतिरोधी आंदोलन आरंभ हुआ.

पोलिश गुप्त राज्य की संरचना और देशनिकाला सरकार से उसके संबंध, 1942.

कार्स्की गुप्त संगठन के मुख्य नेताओं से एकत्रित जानकारी के साथ 1940 में जून में वापस एंगर्स में तात्रा पर्वत के पार पैदल चल कर अपने तीसरे मिशन पर गए. मौसम खराब था, इसलिए वह डेमजाटा के स्लोवाकियाई गांव में रात के लिए ठहरे, जहां एक घूसखोर होस्ट ने उन्हें गेस्टापो के हवाले कर दिया. बंदी और उत्पीड़ित, कार्स्की ने गुप्त जानकारी न दे देने के कारण आत्महत्या करने का प्रयास किया. लेकिन उन्हें बचा लिया गया और पोलैंड में लौवी सैक्ज़ के एक अस्पताल में भेज दिया गया. जैन स्लोवीकोव्स्की, प्रतिरोधी में शामिल एक युवा चिकित्सक और सह षड्यंत्रकारियों के एक समूह ने भागने की एक साहसी योजना बनाई.

नौवी सैक्ज़ के एक अस्पताल से कार्स्की को भगाने में सहायता करने के कारण मारे जाने वालों की स्मारक पट्टिका.

सामान्य पोलिश नागरिकों का मनोबल कम करना प्रचलित था, जिसमें से बहुत बड़ी मात्रा (70%) में निवासी गरीब ग्रामीण इलाकों से थे. कार्यरत जीवन निरंतर भय, संदेह और अविश्वास बयान करता था. हिटलर के वफ़ादार आदमियों द्वारा अधिकृत पोलैंड में "अंतिम समाधान" लागू करना आरंभ किए जाने पर पोलिश-यहूदी संबंध, जो युद्ध से पहले तनावपूर्ण थे, कमज़ोर होते गए.  

गुप्त संगठन के नेता कई पोलिश ईसाइयों के यहूदी देशवासियों के प्रति व्यवहार से अवगत थे. वे सेमेटिक-विरोधी को राष्ट्र के नुकसान के रूप में देखते थे. आधिकारिक लीफ़लेट और अवैध प्रकाशनों में, उन्होंने यहूदी-विरोधी आतंक को लागू करने वालों को संभावित परिणामों की चेतावनी दी.

नागरिक प्रतिरोध के गुप्त निदेशालय ने यहूदियों की निंदा करने वालों को "चेतावनी" दी.
कार्स्की ने वर्शेम्स, एक यहूदी परिवार, से अपनी मुलाकात और कैसे उन्होंने उनकी रक्षा करने के लिए एक "ज़्मालकोव्निक" (ब्लैकमेल करने वाला) होने का ढोंग किया था याद किया. 
कार्स्की के सलाहकार और हमराज़, ज़ोफ़िया कोसाक, कैथोलिक गुप्त समूह "फ़्रंट फ़ॉर द रीबर्थ ऑफ़ पोलैंड" और "काउंसिल टू एड ज्यूज़" ("ज़ेगोटा") के सह-संस्थापक, ऐतिहासिक उपन्यास के लोकप्रिय पुस्तकों के लेखक द्वारा लिखित अंडरग्राउंड फ़्रंट फ़ॉर द रीबर्थ ऑफ़ पोलैंड का आधिकारिक प्रकाशन. 

"दुनिया इस अत्याचार को देखती है, इतिहास में अभी तक देखे गए किसी की भी तुलना में सबसे भयानक – फिर भी चुप रहती है…. यह चुप्पी अब सही नहीं जाएगी. इसकी मंशा जो भी हो, लेकिन वे घृणा करने योग्य हैं. अपराध के सामने कोई निष्क्रिय नहीं रह सकता. जो हत्या के सामने चुप रहता है – वह हत्यारे के समान होता है. जो निंदा नहीं करता – वह सहमति देता है."

ज़ोफ़िया कोस्साक ने "प्रोटेस्ट" में लिखा. 

जर्मन-नाज़ी विनियमों का अर्थ था कि वे भी जो बस छिपे हुए यहूदियों के बारे में मात्र जानकारी रखे हुए थे – उनकी सहायता करना और उन्हें छुपाना तो दूर की बात है – उन्हें गंभीर, और भी घातक परिणामों का सामना करना पड़ा. सहायता करने वाले के संपूर्ण परिवार की जान जोखिम में थी. 

15 अक्टूबर, 1941 को जनरल गवर्नर की तीसरी डिक्री हैन्स फ़्रैंक, सामान्य शासन में निवास पर प्रतिरोध लगाते हुए और यहूदियों को दी गई सहायता हेतु मृत्यु दंड देते हुए. 

जर्मन नाज़ी ने 22 जुलाई, 1942 को वॉरसॉ यहूदी बस्ती से ट्रेब्लिंका मृत्यु शिविर में यहूदियों को सामूहिक रूप से ले जाना आरंभ किया. 

वॉरसॉ यहूदी बस्ती से अमश्लैगप्लाट्ज़ की ओर जाते यहूदी, जहां वे ट्रेब्लिंका मृत्यु शिविर में ले जाने के लिए एकत्रित किए जा रहे थे.
जब कार्स्की ने यहूदी बस्ती में प्रवेश किया, लगभग 300,000 यहूदी पहले ही ले जाए जा चुके थे.

1942 की शरद ऋतु में, कार्स्की ने अपना अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण मिशन लिया – वह मिशन जो पोलैंड के शेष यहूदियों की रक्षा कर सकता था. उन्होंने पोलैंड के यहूदियों के हो रहे विनाश को देखा, ताकि वह "अंतिम समाधान" की घटना का आंखों देखा हाल बता सकें. उन्हें यहूदियों की हालत देखने के लिए दो बार वॉरसॉ यहूदी बस्ती में छिपा कर भेजा गया.

"वह दुनिया नहीं थी. वह मानवता नहीं थी. वह नरक जैसा था." - कार्स्की ने 36 वर्ष बाद क्लॉड लैन्ज़मैन से कहा.

"सड़क पर बिना वस्त्र के शव. मैंने अपने गाइड से पूछा, ‘वह यहां ऐसे क्यों हैं?’ उन्होंने कहा 'असल में, उनकी समस्या है. अगर किसी यहूदी की मृत्यु हो जाती है और उसका परिवार उसे दफ़नाना चाहता है, तो उन्हें उसके लिए कर देना पड़ता है. इसलिए वह उन्हें सड़क पर फेंक देते हैं. वह इसका खर्च नहीं उठा सकते. ऐसा कहा जाता है, ‘प्रत्येक कपड़ा मायने रखता है’, इसलिए वे उनके कपड़े ले लेते हैं."

1978 में कार्स्की ने क्लॉड लैन्ज़मैन को यहूदी बस्ती के अपने दौरे का वर्णन किया.

यहूदी नेता जिन्होंने कार्स्की को यहूदी बस्ती में छिपा कर भेजा था, उनके लिए जर्मन नाज़ी ट्रांसिट शिविर में जाने की व्यवस्था की थी, जहां वे यहूदियों को मृत्यु की ओर भेजने के लिए ट्रेन में एकत्रित किया जाना देख सकें. कार्स्की इज़बिका ट्रांसिट शिविर में वेष बदलकर पहुंचे. कई वर्षों तक उन्हें लगा कि वह बेलज़ेक में यातना शिविर में थे, जैसा उन्होंने उसे 1944 के अपनी पुस्तक, "स्टोरी ऑफ़ अ सीक्रेट स्टेट" में वर्णित किया था. बाद में उन्होंने इस भयानक अनुभव को लैन्ज़मैन के "शोह" के लिए अपने साक्षात्कार में याद किया.

कार्स्की ने फ़्रैंच फ़िल्म निर्माता क्लॉड लैन्ज़मैन के साथ अपने साक्षात्कार में इज़बिका का अपना दौरा याद किया, 1978. 
अमश्लैगप्लाट्ज़, स्टॉवकी स्ट्रीट, वॉरसॉ 1942 में ट्रेंब्लिंका के लिए ट्रेन में यहूदी एकत्रित किए जाते हुए.
कार्स्की ने क्लॉड लैन्ज़मैन को "अंतिम समाधान" में जर्मन नाज़ी की विधियां वर्णित की. 

"उन्हें टक्कर मार कर, गोली मार कर ट्रक में ढकेला जा रहा था. वे उनके शरीर को उठा कर, ट्रक में उन्हें सिर के बल ढकेल रहे थे. दो ट्रक भर गए और ट्रेन चल पड़ी. मुझे घिन आ रही थी."

कई बाधाओं का सामना करते हुए, एक से अधिक झूठी पहचानों का उपयोग करके, परिवहन माध्यम और चालाकी से कार्स्की नवंबर के अंत में लंदन पहुंचे. वहां उन्होंने लंदन-आधारित देशनिकाला पोलिश सरकार के लिए विस्तारित लिखित रिपोर्ट तैयार की और उसके बारे में ब्रिटिश विदेश सचिव एंथनी एडेन के वरिष्ट लोगों को जानकारी दी, फिर, उन्हें वॉशिंगटन भेजा गया जहां वह एक घंटे राष्ट्रपति फ़्रैंक्लिन डी. रूज़वेल्ट से मिले. उन्होंने दोनों नेताओं से यहूदी नरसंहार को रोकने के लिए समर्थन मांगा. दुर्भाग्यवश, उनकी प्रार्थना को अनसुना कर दिया गया.  

जर्मन-अधिकृत पोलैंड में यहूदियों के सामूहिक नरसंहार पर मित्र राष्ट्र और तटस्थ सरकारों को एक नोट, 10 दिसंबर, 1942.

10 दिसंबर, 1942, पोलिश विदेश मंत्रालय ने अन्य रिपोर्ट सहित कार्स्की की आंखों देखी रिपोर्ट के आधार पर अधिकृत पोलैंड में यहूदी राष्ट्र के हो रहे नरसंहार को वर्णित करते हुए संयुक्त राष्ट्र को एक नोट सबमिट किया. 

एक सप्ताह के बाद, मित्र राष्ट्रों ने यूरोप में यहूदियों के नरसंहार की जर्मन नीति की औपचारिक रूप से निंदा की. ब्रिटिश विदेश सचिव एंथनी ऐडेन ने कॉमन्स में घोषणा पत्र की शर्तें पढ़ी और सदस्य इसके लिए एकजुट समर्थन के प्रदर्शन के रूप में मौन खड़े रहे. BBC ने संध्या समाचार में घोषणा पत्र को प्रसारित किया.

"12 मित्र राष्ट्रों के ध्यान को यूरोप के कई रिपोर्ट पर केंद्रित कर दिया गया था कि जर्मन प्राधिकरण, जो उन सभी प्रदेशों में जहां उनका असभ्य शासन चलता है यहूदी लोगों को सबसे प्राथमिक मानव अधिकार देने से इंकार करने से संतुष्ट नहीं थे, अब यूरोप में यहूदी लोगों के नरसंहार की हिटलर के दोहराए गई मंशा को वास्तविक रूप दे थे. ... ऊपर-उल्लिखित राष्ट्र और फ़्रेंच राष्ट्रीय समिति ने सबसे कड़े संभव शब्दों में निर्दयी नरसंहार की क्रूर नीति की निंदा की. उन्होंने घोषणा की कि इस तरह की घटनाएं केवल यह सुनिश्चित करने के उनके इस पवित्र संकल्प की पुनः पुष्टि करती है कि इन अपराधों के लिए जिम्मेदार लोग प्रतिशोध से बच नहीं पाएंगे और उसका अंत करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक उपाय लागू किए जाएंगे. "

यहूदियों के नरसंहार की ज़िम्मेदारी के मामले में 12 मित्र राष्ट्रों का घोषणा-पत्र, 17 दिसंबर, 1942.

कार्स्की ने अपने चौका देने वाली आंखों देखी हालत को दर्जनो लोगों को बताया – राजनेता, पत्रकार, लेखक – स्वतंत्र दुनिया के नेता. उन्होंने स्वयं ब्रिटिश विदेश सचिव एंथोनी ईडेन, अमेरिकी राज्य सचिव कॉर्डेल हल, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फ़ेलिक्स फ़्रैंकफ़र्टर और यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट को इसकी रिपोर्ट की. दूतों ने नेताओं से कार्रवाही करने की प्रार्थना की. यहूदी नेताओं की मांग को संचारित करके, उन्होंने उनके द्वारा देखे गए की विस्तृत जानकारी बयान की. “मैं एक कैमरा था”, “मैं एक मशीन था”, “मैं ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड की तरह था” – वह बाद में कहा करते थे. 

1943 में जैन कार्स्की.

“मैं ग्रामोफ़ोन की तरह था.”

कार्स्की बाद के दिनों में कहा करते थे. 
कार्स्की ने अपनी सबसे यादगार मुलाकात याद की: ज़्मूल ज़ायगिएबोएम के साथ, देशनिकाला पोलिश सरकार के राष्ट्रीय परिषक के एक सदस्य.
ज़्मूल ज़ायगिएबोएम से मुलाकात के कुछ महीनों के बाद, अप्रैल 1943 में, वॉरसॉ यहूदी बस्ती के यहूदियों ने विद्रोह किया जिसे वॉरसॉ यहूदी बस्ती विद्रोह के नाम से जाना जाता है. हल्के और दुर्लभ हथियारों के साथ, वे तीन सप्ताह तक डटे रहे. मई 1943 के मध्य में, दुश्मन ने संपूर्ण बस्ती को और जो उनमें थे उन्हें जला दिया. सिवाय सुलगते खंडहर के कुछ नहीं बचा.

ज़्मूल ज़ायगिएबोएम ने लंदन में आत्महत्या कर लिया. उन्होंने एक पत्र छोड़ा जिसमें लिखा था कि उनकी आत्महत्या यहूदियों के प्रति मित्र राष्ट्रों की निष्क्रियता के विरुद्ध एक विद्रोह था और यह आशा की कि उनकी मृत्यु शेष बचे कुछ यहूदियों के जीवन की रक्षा करेगी. 

"दूसरे विश्व युद्ध के दौरान यहूदियों की समस्या ज़ायगिएबोएम की मुत्यु थी. यह वह घटना थी जो दुनिया की इस संपूर्ण विवशता, यह बेपरवाही दर्शाती थी."
ज़्मूल ज़ायगिएबोएम का विदाई पत्र, 11 मई, 1943
28 जुलाई, 1943 को, कार्स्की ने अधिकृत पोलैंक की स्थिति पर राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट को रिपोर्ट दी और यहूदी राष्ट्र की स्थिति बताई.
राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट

जैन कार्स्की की तरह सभी लोगों ने इसकी अपेक्षा की होगी कि राष्ट्रपति फ़्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट, मानवता के देवताओं में से एक, उस यहूदी नरसंहार को रोक सकते थे और अपने राष्ट्र के प्रमुख कमांडर के रूप में सशस्त्र सेना का उपयोग करके शेष यहूदियों को बचा लेंगे. फिर भी, युद्ध के कई समय बाद अमेरिकी सरकार ने कार्रवाई की और युद्ध शरणार्थी बोर्ड स्थापित किया, परिणामस्वरूप लगभग 200,000 यूरोपीय यहूदियों को बचा लिया गया.

1943 में, कार्स्की संयुक्त राज्य सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश फ़ैलिक्स फ़्रैंकफ़र्टर से मिले. न्यायाधीश द्वारा बड़े पैमाने पर मानवीय क्रूरता की संभावना अस्वीकार करने के तरीके से कार्स्की बहुत निराश हुए.

“मेरा मन, मेरा हृदय, ये इस तहर से बने हैं कि मैं उसे स्वीकार नहीं कर सकता. मैं इंसानों का जज हूं. मुझे मानवता पता है. मैं इंसानों को जानता हूं. यह असंभव है! बिल्कुल भी नहीं!”

फ़ैलिक्स फ़्रैंकफ़र्टर ने कार्स्की की रिपोर्ट सुनने के बाद कहा. 

जर्मन-नाज़ी द्वारा उनकी पहचान कर लिए जाने पर, कार्स्की पोलैंड वापस नहीं लौट सकते थे. देशनिकाला सरकार ने उन्हें एक नया असाइनमेंट दे दिया: सोवियत शासन से संकट में पोलैंड के प्रति लोगों की राय प्रभावित करने के लिए हॉलीवूड को पोलिश युद्ध प्रयास पर एक मूवी बनाने के लिए राजी करवाना. फ़िल्म न बन पाने के बाद, कार्स्की ने दिन और रात पोलिश गुप्त संगठन और युद्ध के दौरान उनके अनुभव पर एक पुस्तक पर कार्य किया. “स्टोरी ऑफ़ सीक्रेट स्टेट” अमेरिका में हॉगटन मिफ़िन द्वारा प्रकाशित हुई थी, और रातों-रात हंगामा मचा दिया था, उसकी 400,000 प्रतियां बिकीं. उसे शीघ्र ही फ़्रेंच, स्वीडिश, नोर्वेजियन और आइसलैंडिक में अनुवाद किया गया.

"स्टोरी ऑफ़ सीक्रेट स्टेट" का पहला संस्करण.

"स्टोरी ऑफ़ सीक्रेट स्टेट" के बेस्टसेलर बन जाने के बाद, कार्स्की को पोलिश गुप्त संगठन और नाज़ी द्वारा अधिकृत पोलैंड पर लेक्चर देने के लिए संपूर्ण अमेरिका और कनाडा में आमंत्रित किया गया. फिर रातों-रात स्थिति बदल गई.

कार्स्की ने पोलिश गुप्त संगठन पर संपूर्ण अमेरिका और कनाडा में लेक्चर दिया.

1945 में, अमेरिकी सरकार ने नई सोवियत-अधिरोपित पोलिश कठपुतली सरकार को लबलिन में मान्यता दी. कार्स्की और पोलैंड, जिसका वह प्रतिनिधित्व करते थे, उसे “अंकल जो” स्टालिन के आदेश पर अनदेखा कर दिया गया. सोवियत शासन के अंदर पोलैंड में विरोधी दल के लिए कोई स्थान नहीं था. परिणामस्वरूप, गुप्त संगठन राज्य के सभी जीवित सेनानियों को “प्रतिक्रिया के विभाजित टुकड़े” के रूप में लेबल कर दिया गया और निर्दयता से नए उच्च वर्गीय शासक द्वारा उनका अंत कर दिया गया.   

1943 में जैन कार्स्की.

पोलैंड वापस लौटने में असमर्थ, कार्स्की ने अमेरिका में अपना नया जीवन आरंभ किया. उन्होंने संघर्ष किया, अपनी आमदनी के लिए घर सजाए. उन्हें जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष एडमंड ए. वॉल्श ने एक अकादमिक करियर की शुरुआत करने के लिए आमंत्रित किया. 40 वर्षों तक जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय कार्स्की का घर बना रहा, जहां उन्होंने विदेशी सेवा स्कूल में पढ़ाया, भविष्य के नेताओं की पीढ़ियों को प्रभावित किया.  

1952 में, जैन कार्स्की ने जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में Ph.D. प्राप्त की. 

1965 में, जैन कार्स्की ने पोलिश-यहूदी डांसर-कोरियोग्राफ़र पोला निरेन्सका, उनके जीवन का प्रेम, से विवाह किया. युद्ध के दौरान मृत्यु शिविर में उनके अधिकांश यहूदी परिवार की हत्या कर दी गई थी. केवल निरेन्सका और उनके माता-पिता भागने में सफल हो पाए थे. उन्होंने डांसर बनने के अपने सपने को पूरा करने के लिए पोलैंड को शुरुआती अंतरयुद्ध के दौरान छोड़ दिया था, जबकि उनके माता-पिता ने यूरोप के यहूदियों से मिल रहे खतरे के आभास के कारण 1930 में पैलेस्टीन चले गए. 

विवाह से ठीक पूर्व निरेन्स्का ने एक कैथोलिक बपतिस्मा लिया. कार्स्की ने बाद में बताया कि उनकी पत्नी को यह तथ्य अच्छा लगा कि कैथलिक धर्म के भगवान ने अपने पुत्र की मां के लिए एक यहूदी स्त्री को चुना. 

30 वर्षों तक कार्स्की ने द्वितीय विश्व युद्ध के अपने अनुभव के बारे में कुछ नहीं कहा लेकिन जब यहूदियों के बलिदान पर एक डॉक्यूमेंटरी बना रहे फ़्रांसीसी फ़िल्म निर्माता, क्लॉड लैंज़मैन ने उनसे ज़िद की तब जाकर उन्होंने अपनी कहानी बड़े पैमाने पर बताने के लिए हामी भरी.

कार्स्की के “दूसरे मिशन” के लिए आठ-घंटा लंबा साक्षात्कार मंच तैयार किया गया जिसमें उन्होंने यहूदियों के बलिदान और मुक्त संसार नेताओं की कर्महीनता के बारे में बताया. एक प्रोफ़ेसर होने के नाते, उन्होंने व्यक्तिगत अन्तरात्मा और उसके मूल्यों की महत्ता के बारे में बताया और राष्ट्रों, संगठनों और राज्यों की निर्दय व्यावहारिकता की निंदा की.

क्लॉड लैन्ज़मैन के "शोह" में, कार्स्की ने 30 वर्षों के बाद अधिक व्यापक दर्शकों को अपनी कहानी बतायी.

"मैं अपनी यादों में वापस नहीं जाता ... मैं उसके बारे में बात नहीं करता." 

1980 की शुरुआत में कार्स्की ने अपना “दूसरा मिशन” आरंभ किया: दुनिया को मित्र राष्ट्रों के बेपरवाही के बारे में याद दिलाकर.

"भगवान ने मुझे युद्ध के दौरान बोलने और लिखने का कार्य सौंपा, जैसा कि मुझे प्रतीत हो रहा था --- इससे हमें मदद मिलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब युद्ध समाप्त होने को आया तब मैंने सीखा कि सरकार, नेता, विद्वान, लेखक किसी को भी नहीं पता था कि यहूदियों के साथ क्या हो रहा था. वे यह सब देखकर चकित थे. साठ लाख मासूम यहूदियों कि हत्या एक रहस्य था, 'एक भयावह रहस्य था'....इस घटना के बाद मैं एक यहूदी बन गया. लेकिन मैं एक यहूदी ईसाई हूं. मैं कैथोलिक धर्म का पालन करता हूं....मेरा विश्वास मुझसे कहता है कि दलाली करना, छुपाना, अज्ञानता, असंवेदनशीलता, स्वार्थ, पाखंड, भावहीन पुनर्गठन को अपनाकर मनुष्यों ने दूसरा वास्तविक पाप कर दिया है. यह पाप मानवता को उसके अंतिम समय तक प्रताड़ित करता रहेगा लेकिन यह मुझे प्रताड़ित नहीं करेगा और मैं चाहता हूं कि ऐसा हो."

कार्स्की ने 1981 में अंतर्राष्ट्रीय मुक्तिदाता सम्मेलन में कहा.

जून 1982 में जैन कार्स्की ने जेरूसलेम में स्थित स्मारक पर पूरे देश के सामने एवेन्यू ऑफ राइटयस पर वृक्ष रोपण किया. इसके आने वाले वर्षों में उन्हें कई और महत्वपूर्ण सम्मान दिए गए जैसे उन्हें एंटी-डिफेमेशन करेज टू केयर अवार्ड (1988, जिसका नाम 2012 में बदलकर जैन कार्स्की करेज टू केयर अवार्ड कर दिया गया था); पायस XI अवार्ड (1990); इसेनहावर लिबरेशन मेडल (1991); वॉलेनबर्ग मेडल (1991); और राष्ट्रपति बारक ओबामा द्वारा प्रेसिडेंशियल मेडल ऑफ फ्रीडम (2012) से सम्मानित किया गया.

7 जून, 1982 को, यैड वाशेम ने कार्स्की को राष्ट्रों में सबसे न्यायसंगत होने की मान्यता दी.
12 मई, 1994 को, प्रोफ़ेसर कार्स्की को इज़रायल की मानद नागरिकता से सम्मानित किया गया था.

“आज, मैं जैन कार्स्की – एक कोज़िल्वेस्की – एक पोलैंड निवासी, एक अमेरिकी, एक कैथोलिक, एक इज़राइली भी बन गया हूं! ग्लोरिया, ग्लोरिया इन एक्सेल्सिस डियो. यह मेरे जीवन का सबसे गर्व का और अर्थपूर्ण दिन है. इज़राइली राज्य की नागरिकता पाकर मैंने अपने ईसाई धर्म पर विश्वास के आध्यात्मिक स्रोत को पा लिया है.“

कार्स्की ने 1994 में इज़राइल की मानद नागरिकता स्वीकार करते समय कहा. 

प्रोफ़ेसर कार्स्की केवल एक साधारण मनुष्य थे. वे किसी भी तरह के अंधी-देशभक्ति से दूर एक सच्चे राष्ट्रीय नायक थे. जैन कार्स्की इगल्स पुरस्कार मिलते समय एडम मिचनिक ने कहा था कि वे “पोल्स ऑफ योर का गर्व और इसकी उत्कृष्टा थे."

1980 और 1990 में युद्ध के बाद पोलिश-यहूदी भाषा पर कार्य कर, प्रोफ़ेसर अमेरिकी और विश्वभर में पोलैंड और यहूदियों के बीच की कटु दूरी को मिटाने में प्रयासरत थे. कार्स्की में साहस था कि वे दुनिया के नियमों के विपरित होकर अपने उद्देश्य को पूरा कर सकें. वे पोलिश का समदेशी व्यवहार और पोलैंड की राजनीति की समालोचना करने से कभी नहीं घबराए.

1989 में साम्यवाद का पहले पोलैंड में, उसके बाद मध्य यूरोप के बाकी हिस्सों में विघटन हुआ. 1980 में सॉलिडार्नोस्क (संघीभाव), मुक्त कर्मचारी संघ, जॉन पॉल II के सिद्धांत और पोलैंड में लोकतांत्रिक समर्थक विरोधी के निरंतर कार्य की स्थापना से अवनति की शुरूआत हो चुकी थी. कार्स्की – जिन्हें पोलिश पिपल्स रिपब्लिक में पर्सोना नॉन ग्राटा यानि अप्रिय व्यक्ति कहा जाता था – को अंततः उन्हें उस पद से सम्मानित किया गया जिसके वे पात्र थे. 

लेक वालेसा को एकता व्यापार संघ, 10 नवंबर, 1980 के पंजीकरण के बाद उनके समर्थकों द्वारा विजय प्राप्त हुई.
4 जून, 1989 को नई लोकतांत्रिक पोलैंड में पहली बार हुए चुनाव के पोलिश चुनाव के पोस्टर. 
1995 में, राष्ट्रपति लेक वालेसा से कार्स्की ने उच्चतम पोलिश नागरिक पुरस्कार प्राप्त किया, द व्हाइट ईगल.
जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय का विदेशा सेवा स्कूल, जहां कार्स्की ने 40 वर्षों तक साम्यवाद का इतिहास और वैश्विक संबंधों के विषय में पढ़ाया है, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और वैश्विक संबंध में रूचि रखने वाले युवा अमरीकी और अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों के लिए यह एक प्रमुख विश्वविद्यालय है. आज के कई प्रमुख नेता, सामुदायिक और व्यावसायिक नेता कार्स्की के विद्यार्थी थे.

कार्स्की का निधन 13 जुलाई 2000 को हुआ था लेकिन उनकी विरासत आज भी बरकार है. जब तक युद्ध में बर्बाद हुए अधिकृत पोलैंड में यहूदियों के बलिदान की दर्दनाक कहानी युवा और वृद्धों तक पहुंचती रहेगी तब तक यह मिशन चलता रहेगा. जीवन में विषम परिस्थितियों का सामना करने की विधि की आवश्यकता के कारण कार्स्की की सोच विश्वभर में जीवंत रहेगी. उनको मानने वाले सच्चाई के संदेशवाहक बनना सीखते हैं. मानवता के नायक, जैन कार्स्की हमें हर जगह पीड़ीत लोगों की ओर से कार्रवाई करने की प्रेरणा देते हैं.

कई लोगों और संस्थाओं ने प्रोफ़ेसर कार्स्की और उनके कार्यों की स्मृती बनाने में अपना सबकुछ लगा दिया है और आज इनका यह प्रयास बहुत तेज़ी से बढ़ता हुआ दिखाई दे रहा है. वॉरसॉ में स्थित पोलिश इतिहास संग्रहालय, जैन कार्स्की शिक्षण संस्थान में प्रारंभ हुए जैन कार्स्की अमेरिकी शतवर्षीय योजना के सहयोग से जैन कार्स्की के अपूर्ण कार्यों को पूरा कर रहा है. इन सहयोग प्रयासों का उद्देश्य इस महान व्यक्तित्व को लोगों के सामने लाना और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षण गतिविधियों, सार्वजनिक कार्यक्रमों और कला प्रदर्शनियों के माध्यम से कार्स्की द्वारा छोड़ी गई विरासत को फैलाना है. यह महान कार्य उनके शतवर्षीय जन्मदिन पर 2014 तक किए जाने का प्रयास है. हालांकि यह प्रयास इसके बाद भी निरंतर जारी रहेगा. 

जैन कार्स्की, मार्च 2000.
पूर्व पोलिश विदेश मंत्री एडम डैनियल रोटफ़ेल्ड, जैन कार्स्की के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से प्रेसिडेंटियल मेडल ऑफ़ फ़्रीडम स्वीकार करते हुए, 29 मई, 2012. 

“हमें अपने बच्चों को इस दर्दनाक हादसे के कारण के बारे में बताना होगा – क्योंकि कई लोगों ने अपना अत्यंत भयानक अंत देखा था, क्योंकि कई लोग चुपचाप खामोश खड़े थे. लेकिन हमें अपने बच्चों को उन लोगों के बारे में भी बताना होगा जो अपने राष्ट्र के लिए ईमानदार रहे. इनमें से एक थे युवा पोलिश कैथोलिक, जैन कार्स्की – जिन्होंने यहूदियों को जानवरों की गाड़ी में भर-भर कर ले जाते हुए देखा था, जिन्होंने उन्हें मरते हुए देखा था और जिन्होंने राष्ट्रपति रूज़वेल्ट के सामने सारी सच्चाई बताई थी. जैन कार्स्की को गुज़रे हुए एक दशक हो चुका है लेकिन आज मैं गर्व के साथ घोषणा करता हूं कि इस बसंत, मैं उन्हें अमेरीका के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक उपाधि – प्रेसिडेंटियल मेडल ऑफ़ फ़्रीडम से सम्मानित करूंगा. 

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, 23 अप्रैल, 2012, यूनाइटेड स्टेट्स हॉलोकॉस्ट मेमोरियल संग्रहालय (संयुक्त राज्य यहूदी नरसंहार स्मारक संग्रहालय).
आभार: कहानी

Curation — Dorota Szkodzińska, Polish History Museum
Edition — Wanda Urbańska, director of the Jan Karski US Centennial Campaign
Under the supervision of — Ewa Wierzyńska, leader of Jan Karski. Unfinished Mission program, Polish History Museum
IT support — Artur Szymański 
We would like to thank all partners in the project: — The Museum of the City of Łódź, The Jewish Historical Institute in Warsaw, E. Thomas Wood, Carol Harrison, Hoover Archives, The United States Holocaust Memorial Museum.
Exhibit's origins — The exhibit is one of the projects of Jan Karski. Unfinished Mission program run by Polish History Museum. More information on www.JanKarski.org and www.JanKarski.net.

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