2018

हुनरमंद बुनकर

Dastkari Haat Samiti

इसमें गुमनाम कारीगर से लेकर कलाकार तक शामिल हैं

Sualkuchi Weaving: Silk weaving of Assam, Anuradha Pegu, weaver and National Award recipient, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti
जहां एक ओर कलाकार अपने खास नज़रिए और रचनात्मकता के लिए मशहूर होते हैं, वहीं दूसरी ओर पारंपरिक शिल्पकार ज़्यादातर गुमनाम ही बने रहते हैं. हुनर को ही पहचान मिलती है: कला में ही उसका पारंपरिक सौंदर्य झलकता है और रचना ही खुद अपनी कहानी बयां करती है. कला के जिस्म में उसकी तकनीक और कौशल नज़र आता है.
Sualkuchi Weaving: Silks of Assam, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti
हालांकि, पारंपरिक कला जगत में समय-समय पर कोई न कोई ऐसा व्यक्ति उभरता है जो अपने अनूठे रास्ते खुद बनाता है. वे लोग सिर्फ़ पारंपरिक कौशल के लिए नहीं जाने जाते, बल्कि उनका नाम ब्रैंड के तौर पर मशहूर हो जाता है. भारत के उत्तर पूर्वी राज्य असम के रेशम बुनाई समुदाय की ऐसी ही दो शख्सियत हैं, अनुराधा पेगू और नर्मोहन दास.
Sualkuchi Weaving: The weaver entrepreneur outside her home, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti
अनुराधा पेगू: दुनिया के सामने मिशिंग के डिज़ाइन पेश करने वाली बुनकर महिला हैं
मिशिंग जनजाति से ताल्लुक रखने वाली अनुराधा पेगू बुनकर समुदाय की हैं. जैसे पूरे इलाके के बुनकर अपने बुज़ुर्गों से बुनाई का कौशल सीखते हैं, उसी तरह अनुराधा पेगू ने भी अपने समुदाय में पहने जाने वाले कपड़े बुनने का हुनर बचपन से सीखा था.
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उन्होंने अपने ब्रैंड से खास वस्त्र बनाने के लिए, बुज़ुर्गों से सीखे हुनर का इस्तेमाल बुनियाद के तौर पर किया. अब उनके बुने कपड़े फ़ैशन रैंप और खास बुटीक में दिखाई देते हैं. वो इलाकाई और प्राकृतिक धागों और रंगों का इस्तेमाल करती हैं. साथ ही, उनमें असम के अलग-अलग समुदायों की पारंपरिक कलाएं भी शामिल कर देती हैं. न
Sualkuchi Weaving: Silk weaving of Assam, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti

असम की पारंपरिक रेशम बुनाई में इलाकाई और प्राकृतिक चीज़ें इस्तेमाल की जाती थी. धागा बनाने और कपड़ा बुनने में काफ़ी मेहनत लगती थी, लेकिन जब अपने काम से मोहब्बत होती है, तो संकरी पीठ वाले पट्टे पर कपड़ा बुनना वाकई आसान हो जाता है.

यहां, कारीगर प्राकृतिक रंगाई के काम में जुटे हैं.

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आगे की ओर आपको दिखाई देगा कि पीला रंग बनाने के लिए हाथ से हल्दी कूटी जा रही है, जबकि पीछे रखे बर्तन में धागे को ज़रूरी तापमान तक उबाला जा रहा है.

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आगे की ओर आपको दिखाई देगा कि पीला रंग बनाने के लिए हाथ से हल्दी कूटी जा रही है, जबकि पीछे रखे बर्तन में धागे को ज़रूरी तापमान तक उबाला जा रहा है.

Sualkuchi Weaving: Silk weaving of Assam, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti

रंगे हुए धागों को सूखने के लिए लटकाया गया है. पीला रंग हल्दी से और गुलाबी रंग लाख से लिया गया है. असमिया वस्त्र पारंपरिक तौर से बुने और प्राकृतिक रंगों से रंगे जाते थे, लेकिन अब सिर्फ़ कुछ ही बुनकर पुराने तरीके इस्तेमाल करते हैं. ज़्यादातर बुनकर अब रासायनिक रंगों का इस्तेमाल करने लगे हैं.

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अनुराधा पेगू के कपड़ों में मिशिंग की खास कला और रंगों की झलक दिखाई देती है.

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मिशिंग के डिज़ाइन वाले कपड़ों पर तरह-तरह की कलाएं. समुदाय की जीवन शैली में शामिल पशुओं और आकृतियों को पारंपरिक डिज़ाइन में पिरोया गया है.

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मेखला (सैरांग जैसा महिलाओं का परिधान), एक पुराने डिज़ाइन पर आधारित है. इसे फिर से इस्तेमाल करना शुरू किया है. अलंकरण, असम के बहुत पुराने और खास डिज़ाइन हैं. इनमें प्राकृतिक रंग इस्तेमाल किए जाते हैं.

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अलंकरण, असम के बहुत पुराने और खास डिज़ाइन हैं. इनमें प्राकृतिक रंग इस्तेमाल किए जाते हैं.

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महिलाएं जो चादर या शॉल इस्तेमाल करती हैं उन्हें कच्ची हल्दी से रंगा जाता है. काले रंग की आभा लोहे से मिलती है. डिज़ाइन में सुनहरा रंग मूंगा रेशम से आता है. इसे प्राकृतिक अवस्था में ही इस्तेमाल किया जाता है यानी कि इसे रंगा नहीं जाता.

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असम में पारंपरिक रीति-रिवाजों से होने वाली शादियों में दुल्हन सफ़ेद और सुनहरी पोशाक पहनती है. अनुराधा ने दुल्हन की इस पोशाक में सुनहरा अलंकरण डिज़ाइन करने ले लिए, बिना रंगे गए मूंगा रेशम को उसके प्राकृतिक रूप में ही इस्तेमाल किया है: मुख्य अलंकरण में चरखे से तैयार धागा इस्तेमाल किया जाता है, जबकि अलंकरण के अंदरूनी हिस्से में हाथ से काते गए धागे का इस्तेमाल किया जाता है.

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इसी डिज़ाइन में एक कपड़े को लाख से रंगा गया है.

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बुनाई का पारंपरिक तरीका बहुत धीमा था. इसकी रफ़्तार इतनी कम होती थी कि हाथों से बने कपड़े सिर्फ़ खुद ही इस्तेमाल किए जा सकते थे. एरी रेशम जैसे हाथ से काते गए धागे बनाने के लिए, लकड़ी की धुरी अब भी इस्तेमाल की
जाती है.

हालांकि, चित्र में नज़र दिखाई दे रही, हाथ से बनी बांस की डंडी शायद ही कभी व्यावसायिक उत्पादन में इस्तेमाल की जाती हो. व्यावसायिक बाज़ार के लिए कपड़े बनने वाले ज़्यादातर बुनकरों ने अब औद्योगिक रूप से बने इस्पात के हथकरघे अपना लिए हैं.

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असमिया रेशम में अब देश के अलग-अलग हिस्सों के धागे इस्तेमाल किए जाते हैं. अनुराधा सिर्फ़ अपने इलाके की चीज़ें
इस्तेमाल करती हैं. एरी और मूंगा असम के दो सबसे बढ़िया रेशम माने जाते हैं. जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस इलाके में पैट या नूनी रेशम का उत्पादन भी होता है. यह रेशम इसी इलाके में शहतूत के पेड़ों पर पलने वाले कीड़ों से हासिल किया जाता है.

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नर्मोहन दास: रेशम उद्योग के हर हिस्से में सतत रूप में काम करते हैं
नर्मोहन दास असमिया रेशम वस्त्र जगत के एक और विशेषज्ञ हैं. नर्मोहन अपने स्तर पर रेशम के धागे तैयार करते हैं और उन्हें प्राकृतिक रंगों से रंगते हैं. उन्हें अपने काम में महारत हासिल है. नर्मोहन दास एक सामाजिक उद्यमी हैं जिन्होंने रेशम वस्त्र जगत में भी अपनी पहचान बनाई है.
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हालांकि, वो खुद बुनकर नहीं है, लेकिन उनका ताल्लुक ऐसे परिवार से है जहां महिलाएं पारंपरिक रूप से काते गए रेशम का इस्तेमाल करती हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत रेशम के धागे से की, लेकिन वे जल्द ही कताई और बुनाई के कारोबार में शामिल हो गए. प्राकृतिक रंगों और बुनाई के बुनियादी तौर तरीके इस्तेमाल करना ही नर्मोहन की खासियत है. उनके कपड़े बहुत सजावटी नहीं होते. उनमें कलाकारी और डिज़ाइन भी नहीं होते, बल्कि उनका प्राकृतिक रंग-रूप और अछूता सौंदर्य मन मोह लेता है.
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मूंगा रेशम, प्राकृतिक रूप से सुनहरे रंग का होता है और यह असम के जंगलों से मिलता है. रेशम का कीट बहुत नाज़ुक
होता है और मौसम जैसी बाहरी हालत के लिए बेहद संवेदनशील होता है. नर्मोहन ने छोटे पैमाने पर रेशम के कीट पालने वाले लोगों का नेटवर्क बनाया है. ये लोग सबसे अनुकूल हालत में रेशम के कीट पालते हैं, ताकि उनसे शानदार सुनहरे रंग वाले रेशम का उत्पादन किया जा सके.

Sualkuchi Weaving: Silk weaving of Assam, 2018-03, इनके संग्रह से लिया गया है: Dastkari Haat Samiti

नर्मोहन दास एरी रेशम का इस्तेमाल भी करते हैं. यह असम और उसके पहाड़ी इलाकों के लिए भी अनूठा है. प्राकृतिक रंगाई के महारथी के तौर पर वो एरी को तरह-तरह के प्राकृतिक रंगों में रंगते हैं.

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घिचा रेशम, कमोबेश बेकार हो चुके रेशम से बनाया जाता है. इससे मोटी बुनाई वाले कपड़े बनते हैं और उत्तर पूर्वी भारत के दूरदराज के इलाकों में इसका पारंपरिक बाज़ार है. नर्मोहन ने इस कपड़े के लिए यूरोप में एक नया बेहतरीन बाज़ार भी बना लिया है.

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हर तरह के धागे की अपनी खास अहमियत है और कपड़ा बनाने के तरीके से तरह-तरह की बुनावट और डिज़ाइन वाली पोशाकें तैयार होती हैं.

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ट्वील बुनाई से सुनहरा मूंगा रेशम मुलायम कपड़े में ढल जाता है.

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बहुत महीन कपड़ा बुनने के लिए भी इसी मूंगा रेशम का इस्तेमाल किया जाता है.

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नर्मोहन के बेहतरीन भंडार में शामिल, हाथ से बुने रेशमी स्टोल पूरे भारत के साथ-साथ पश्चिमी बाज़ारों में भी काफ़ी
मशहूर हैं. इनमें इस्तेमाल किए गए सभी रंग प्राकृतिक हैं.

बाएं से, ऊपर की पंक्ति में: गाढ़ा सलेटी – आंवला + लोहा (2 डिप), गाढ़ा हरा – हल्दी + नील; गाढ़ा नीला – नील (2
डिप); प्राकृतिक - चाय. दूसरी पंक्ति में: पीला – हल्दी; बैंगनी – नील + सप्पन की लकड़ी; सलेटी – आंवला + लोहा;
लाल – सप्पन की लकड़ी; नीचे की पंक्ति में: नीला – नील; हल्का हरा – प्याज़ का छिलका; प्राकृतिक – चाय.

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सुआलकुची की बुनाई परंपराओं के बारे में यहां ज़्यादा पढ़ें:

- सुआलकुची: असम का व्यावसायिक बुनाई एन्क्लेव
- असमिया रेशम
- असम के सुआलकुची कस्बे की हथकरघा बुनाई संस्कृति

दस्तकारी हाट समिति
आभार: कहानी

क्रेडिट: लेख
टेक्स्ट: अलोका हिरेमठ
फ़ोटोग्राफ़ी: सुबिनॉय दास
कारीगर: सुआलकुची और बिजॉयनगर के कारीगर, गुवाहाटी की तुलतुल बोरा की इकाई, छायगांव की फ़ैब्रिक प्लस
फ़ैक्ट्री में प्रयाग बरुआ और उनके साथी, अनुराधा पेगू, नर्मोहन दास और उनके बुनकर समुदाय के साथी
मौके पर सहयोग: नंदिनी दत्ता, बुनकर सेवा केंद्र, गुवाहाटी के श्री बंदोपाध्याय, अलोका हिरेमठ
क्यूरेशन: रुचिरा वर्मा

क्रेडिट: सभी मीडिया
कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि पेश की गई कहानी किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष ने बनाई हो और वह नीचे दिए गए उन संस्थानों की सोच से मेल न खाती हो, जिन्होंने यह सामग्री आप तक पहुंचाई है.
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