1968 - 1997

जॉन वोस्‍टर स्क्वायर में बिना मुकदमे कारावास

South African History Archive (SAHA)

'...रंगभेद के वर्षों, यातना के वर्षों, सुरक्षा पुलिस के शासन, सनकी बल के शासन का प्रतीक संस्थान...'
बारबरा होगन, पूर्व बंदी
शार्पविले हत्याकांड, 21 मार्च 1960
शार्पविले हत्याकांड, 21 मार्च 1960

1960 और 1990 के बीच रंगभेदी दक्षिण अफ़्रीका में राष्ट्रीय पार्टी की लगातार बनी सरकारों ने राजनैतिक विरोध, बढ़ते हुए प्रतिरोध और विद्रोह का सामना करने के लिए, बिना मुकदमे के कारावास का व्यापक रूप से हाथियार के रूप में इस्तेमाल किया.

1960 में शार्पविले हत्याकांड, अफ़्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (ANC) और पैन अफ़्रीकी कांग्रेस (PAC) के बैन तथा आंशिक आपातकालीन स्थिति की घोषणा के बाद, प्रधानमंत्री एचएफ वरवोर्ड ने बीजे वॉर्स्टर को न्याय मंत्री के रूप में नियुक्त किया. 

बेल्थाज़ार जोहानिस [अफ़्रीकी भाषा में जॉन का समतुल्य] वॉर्स्टर, जिन्होने बाद में प्रधानमंत्री के रूप में वरवोर्ड का स्थान लिया, वह कट्टर “वरक्राम्पटे” अफ़्रीकांस-वासी राष्ट्रवादी थे - जिन्होंने चेतावनी दी थी कि, 

'... किसी भी हालत में कानून और व्यवस्था तोड़ना सहन नहीं किया जाएगा'. 

5 महीने तक आपातकालीन स्थिति बनी रही जिसमें, 11500 से अधिक लोगों को बंदी बनाया गया. राज्य के विरूद्ध किसी भी प्रकार के विरोध को सहन नहीं करने की नीति बनाकर और यह सुनिश्चित करके कि दक्षिण अफ़्रीकी पुलिस की सुरक्षा शाखा के पास विकट शक्तियां रहें, वॉर्स्टर ने तेजी से दक्षिण अफ़्रीका की सुरक्षा नीतियों को कड़ा कर दिया.

दक्षिण अफ़्रीकी पुलिस की सुरक्षा शाखा को मूल रूप से 1940 के दशक के बाद के वर्षों में, तत्कालीन वैधानिक दक्षिण अफ़्रीकी साम्यवादी पार्टी (SACP) की गतिविधियों के जवाब के रूप में स्थापित किया गया था. विश्व युद्ध 2 के मद्देनजर व्यापक साम्यवाद-विरोधी भावनाओं को ध्यान में रखते हुए, साम्यवादी, अश्वेत राष्ट्रवादी और तथाकथित 'अतिवादी' संगठन पर नजर रखने के लिए सुरक्षा शाखा नियुक्त की गई थी.

बीजे वॉर्स्टर की देखरेख में, वे 'सनकी बल' बनकर उभरे जिनका पूरे देश में आंतक था.  

अगस्त 1961 की संडे टाइम्स न्यूज़क्लीपिंग, जिसमें बीजे वॉर्स्टर के सत्ता में आने का विवरण है

'शायद माननीय सदस्यों को याद दिलाना अनुचित नहीं होगा कि महान अमेरीकी वकील, विगमोर, ने एक अवसर पर पूछा था कि,

"अपराधियों के लिए अचानक चिंता क्यों?"

मेरा प्रश्न है कि, 

"दक्षिण अफ़्रीका में साम्यवादियों के लिए अचानक चिंता क्यों?"'

                                - बीजे वोर्स्टर, 1962 में संसद को संबोधित करते हुए
बीजे वोर्स्टर के बारे में, रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ता और राजनेता, हेलेन सुज़मान के विचार
सामान्य कानून संशोधन अधिनियम, 1963
आतंकवाद अधिनियम संख्या 83, 1967 का अनुच्छेद 6

रंगभेद के विरोधियों को शांत करने के लिए बनाए गए अन्य कानूनों के उभरे समूह के साथ-साथ, पूछताछ संबंधी और सजा देने के उद्देश्यों से, साथ ही लोगों को उनके समुदायों और निर्वाचन क्षेत्रों से अलग करने के लिए, बिना किसी मुकदमे के कारावास में भेज दिया जाता था. 

बिना मुकदमे के कारावास भेजने का विकल्प पहली बार 1953 के लोक सुरक्षा अधिनियम में शामिल किया गया था, जिसे अवज्ञा आंदोलन से बढ़ रहे उग्रवाद और विरोध के जवाब में पेश किया गया था. 

1961 में, गैर-आपातकालीन स्थितियों में बिना मुकदमे के अधिकतम 12 दिनों तक कारावास में रखने के लिए, सामान्य कानून संशोधन अधिनियम प्रस्तुत किया गया. ANC और PAC की सशस्त्र गतिविधियों में हुई वृद्धि के जवाब में, 1963 में इसे 90 दिनों के कारावास तक बढ़ा दिया गया था. बिना मुकदमे के 180 दिन के कारावस की अनुमति देने के लिए बाद में इसे संशोधित कर दिया गया था. 

अंत में, 1967 के भयानक आतंकवाद अधिनियम ने पूछताछ के लिए अनिश्चितकालीन कारावास की अनुमति दे दी.

बंदी मजिस्ट्रेट से मिल तो सकते थे लेकिन उन्हें न्यायालय में जाने या किसी कानूनी प्रतिनिधि से मिलने की अनुमति नहीं थी. 

मानवाधिकार वकील, जॉर्ज बिज़ोस, बीजे वॉर्स्टर के अधीन सुरक्षा शाखा में हुए भयानक परिवर्तनों के बारे में बताते हुए

'जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर, यातना चैंबर की पराकाष्ठा थी'    

                                        - जाकी सेरोके, पूर्व बंदी 
जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन का कारावास

40 से अधिक वर्ष पहले, 1968 में अगस्त के अंत के एक सर्दी भरे दिन में, प्रधानमंत्री बल्तहज़ार जॉन वॉर्स्टर ने जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर स्टेशन खोला. इस बात की शेखी बघारते हुए कि नई भव्य इमारत अफ़्रीका का सबसे बड़ा पुलिस स्टेशन थी, उन्होंने जोहान्सबर्ग के व्यापारिक क्षेत्र की सड़क को नज़रअंदाज करने वाली इस अवैध नीली संरचान की घोषणा 'अत्याधुनिक' पुलिस स्टेशन के रूप में की क्योंकि इसमें पुलिस के सभी प्रमुख विभाग एक ही छत के नीचे थे.

शायद इस बिल्डिंग का नाम शायद पूर्व न्याय मंत्री - वॉर्स्टर के नाम पर रखा गया था, जिन्होंने रंगभेद के विरोध को दबाने के लिए कठोर सुरक्षा कानून हेतु बनाए गए संस्थान की देखरेख की थी और सुनिश्चित किया था कि दक्षिण अफ़्रीकी पुलिस (SAP) की सुरक्षा शाखा के पास अत्यधिक अधिकार होंगे.

जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर, जल्द ही क्रूरता और यातना की जगह के रूप में जाना जाने लगा, जो 1970 और 1980 के दशक के दौरान विटवॉटर्सरैंड में कारावास और पूछताछ का प्रमुख स्थान बन गया. 

1970 और 1990 के बीच, आठ लोगों की जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में बंदी बनाए जाने के कारण मृत्यु हो गई, जिन सभी को कारावास विनियमों के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

1968 में जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर के उद्घाटन-समारोह में बीजे वॉर्स्टर बोलते हुए  (SABC के सौजन्य से)
निर्माणाधीन जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर, 1968

जोहान्सबर्ग के मार्शल स्क्वेयर पुलिस स्टेशन को प्रतिस्थापित करने के लिए नई बिल्डिंग का निर्माण 1964 में नं. 1 कमिशनर स्ट्रीट पर आरंभ हुआ था. फ़र्म हैरिस, फ़ैल्स, जैंक्स और नुसबाम द्वारा डिज़ाइन की गई बिल्डिंग, सुरक्षा शाखा के लिए कारावास और पूछताछ हेतु स्थान की बढ़ती आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बनाई गई थी.  

सुरक्षा शाखा के कार्यालय, नए पुलिस मुख्यालय की 9 वीं और 10 वीं मंजिल पर बनाए जाने थे, यह सुनिश्चित करके कि लिफ्ट केवल 9 वीं मंजिल तक जाए, 10 वीं मंजिल तक पहुंच को सीमित कर दिया गया जोकि जल्द ही कुख्यात हो जाने वाली थी. राजनैतिक कैदियों ने 10 वीं मंजिल तक पहुंचने के लिए अंतिम बार सीढ़िया चढ़ी थीं, जहां न जाने कितने बंदियों को यातनाएं दी गईं थी.

बंदियों की कोठरियां नीचे की मंजिल पर थीं, जिन्हें विशेष रूप से एकांत कारावास के लिए बनाया गया था. उन्हें गहरे धूसर रंग से रंगा गया था और उनकी ज़मीन काले रंग की थी. एक किनारे में फोम का गद्दा था, दूसरे में शौचालय था. मोटे फ़ाइबरग्लास से खिड़की और सलाखों को ढका गया था. ऊंची छत के बीचोंबीच एक प्रकाश बल्ब लटका होता था, जिसे कभी बंद नहीं किया जाता था. कोठरियों में बंदी बनाए गए हज़ारों रंगभेद-विरोधी कार्यकर्ताओं के लिए, जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर नरक था.

जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन की 10 वीं मंजिल से दृश्य

'मैं कोठरी की ऊपर की मंजिल पर था, जहां पर मोटा बुलेटप्रूफ़ प्रकार का शीशा लगा था, जहां आप कुछ नहीं कर सकते थे. और इस तरफ भी, सलाखों के ऊपर सभी ओर शीशा लगा था. जिससे कोठरी बिल्कुल अलग रहे. कई बार आपको लगता था कि आप पागल हो रहे हैं. आप इतना सोचेंगे की आपकी सोचने की क्षमता समाप्त हो जाएगी... फिर आपको गंध आएगी, आप उस गंध का हिस्सा बनकर रह जाएंगे...'

                                                                                                                                           - जाबू नेग्वेनिया, बंदी, 1981
मार्च 1977 की SAP पत्रिका के कवर पर, जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर के उपकक्ष में बीजे वॉर्स्टर की कांस्य की अर्धप्रतिमा

'सुरक्षा पुलिस में आत्मविहीन लोगों जैसी क्रूर शांति थी'

                                                - मोलिफि फ़ितो, पूर्व बंदी
जॉन वॉर्स्टर में काम के बाद क्लबहाउस में बातचीत करते सुरक्षा पुलिसकर्मी, दिनांक अज्ञात
पॉल इरासम्स, पूर्व सुरक्षा पुलिसकर्मी

'क्रांतिकारी युद्ध से लड़ना, सामान्य अपराधियों से लड़ने से अधिक कठिन है. आपको याद होना चाहिए कि आप कभी-कभी बुद्धिजीवियों के विरूद्ध लड़ रहे हैं; इस हमले में शामिल सबसे बुद्धिमान लोग आपके विरोधी हैं. आपको इन लोगों से एक कदम आगे होना होगा.

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पूर्व में ये घटनाएं हुईं. अगर मेरे विरोधी याद करते हैं तो यह भी दुर्भाग्यपूर्ण लगता है कि कुछ पुलिसकर्मी बम धमाकों और उनके घरों पर हुए हमलों में मारे गए थे. लेकिन दोनों पक्षों को अपना मत साबित करना था और आपको परिणाम निकालना वाला होना चाहिए…हम वहां गणराज्य की आंतरिक सुरक्षा के संरक्षण के लिए थे. इसलिए कभी-कभी यह बहुत ज्यादा कठिन होता था.'

                                                                                                                       - हेनी हेमन्स, पूर्व सुरक्षा पुलिसकर्मी

1960 से, सुरक्षा शाखा के सभी सदस्यों को यातना देने की तकनीकों का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अध्ययन हेतु भेजा गया था.

सुरक्षा शाखा ने विशेष रूप से जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में पूछताछ की अपनी विधियों में अत्यंत क्रूरता और अमानवीयता बरतने के लिए प्रसिद्ध हो गई थी.

पूरे दिन पूछताछ के काम में लगे रहने वाले प्रश्नकर्ताओं के दल की सभी पूछताछ का आधार बंदियों को सोने न देना, उन्हें पूर्णतः उन पर निर्भर रहने की स्थिति में पहुंचाना था. 

पूर्व-सुरक्षा पुलिसकर्मी पॉल इरासम्स, जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर की 9 वीं मंजिल पर स्थित अपने कार्यालय में अपनी डेस्क के पीछे, दिनांक अज्ञात
पत्रकार जेम्स सैंडर्स, रंगभेद-युग के सुरक्षा बलों की चर्चा करते हुए

जनरल कोटज़ी के अनुसार, हम बहुत सारे बेवकूफ़ थे जिन्होंने पूरी घटना की गलत व्याख्या की. वह सही थे: वह सीधे बोलते थे, “समाज से स्थायी निष्कासन...”, लेकिन उनका यह मतलब नहीं था.

मध्यवर्गीय हमारी तरह ही मन्द बुद्धि थे, उनकी श्रेणी और सामाजिक स्तर निम्न था, लेकिन जो भी हो, मुझे लगता है, वह बेवकूफ़ थे जिन्होने इसकी गलत व्याख्या की. लेकिन सच्चाई यह है कि हमारे पास अविश्वसनीय पैमाने पर मार काट करने और लूटपाट करने के लिए अहस्तक्षेप-नीति थी और आपको पता था कि आप इससे बच सकते थे और ठीक वही हुआ.'

                                                                           पॉल इरासम्स, पूर्व सुरक्षा पुलिसकर्मी
सुरक्षा पुलिस के बारे में बंदी, डॉ. एलिज़ाबेथ फ़्लोड के विचार

वह नौवीं मंजिल से गिर गया

उसने स्वयं को फांसी लगा ली

वह धुलाई के दौरान साबुन के टुकड़े पर फिसल गया

वह नौवीं मंजिल से गिर गया

उसने धुलाई के दौरान खुद फांसी लगा दी

वह नौवीं मंजिल से गिर गया

वह नौवीं मंजिल से लटक गया

वह धुलाई के दौरान नौवीं मंजिल पर फिसल गया

वह साबुन के टुकड़े पर फिसल के गिर गया

वह नौवीं मंजिल से लटक गया

वह धुलाई करते समय नौवीं मंजिल से फिसल गया

वह धुलाई के दौरान साबुन के टुकड़े से लटक गया

                                                                                                                                                      क्रिस वैन वाइक की 'कारावास में'

अहमद तिमोल - मृत्यु 27 अक्टूबर 1971

1971 तक, पूरे दक्षिण अफ़्रीका की जेलों में कारावास के दौरान 21 मौतें हो चुकी थीं. 

इस दिन, जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर की इस सूची में 30 वर्षीय अध्यापक अहमद तिमोल का नाम भी जुड़ गया, जिनकी मृत्यु जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर की 10 वीं मंजिल से गिरने से हुई. वह तत्कालीन प्रतिबंधित दक्षिण अफ़्रीकी कम्यूनिस्ट पार्टी (SACP) के सदस्य थे, जिन्हें पुलिस की नाकाबंदी में प्रतिबंधित साहित्य के स्थानांतरण के लिए गिरफ्तार किया गया था.

पुलिस ने दावा किया कि तिमोल ने आत्महत्या की थी; एक ऐसा बहाना जिसका समर्थन आधिकारिक तहकीकात में किया गया, हालांकि राजकीय रोगविज्ञानी डा. जॉनाथन ग्लकमैन ने कहा कि तिमोल के शरीर पर मृत्यु से पहले मारपीट के निशान मिले थे.

सुरक्षा पुलिस बंदियों से कहा करती थी कि "भारतीय उड़ नहीं सकते" और जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर को "तिमोल हाइट्स" के नाम से पुकारते थे

अहमद के परिवार को आशा थी कि उनकी मृत्यु में शामिल पुलिसकर्मी उनकी मौत का सच बताने के लिए ट्रूथ एंड रिकन्सिलीएशन कमीशन (TRC) की सुनवाइयों में पेश होंगे. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. 

तिमोल की मौत की सुनवाई में न्याय विभाग की तहकीकात की रिपोर्ट
TRC की मनावाधिकार उल्लंघन समिति के आगे, हावा तिमोल का उनके बेटे, अहमद तिमोल, के बारे में बयान, 30 अप्रैल 1996 (SABC के सौजन्य से)
ANC स्मारक पोस्टर से अहमद तिमोल की फ़ोटो 
प्रोफ़ेसर कांतिलाल नायक, बंदी, अक्टूबर 1971 - फरवरी 1972
कारावास के दौरान अपने किसी पूछताछकर्ता का नायक द्वारा टॉयलेट पेपर पर बनाया गया आरेख
बंदी बनाए जाने और 'हेलीकॉप्टर ट्रीटमेंट' (ऊपर लटकाकर यातना देना) का उपयोग करके यातना दिए जाने पर नायक के विचार

दृष्टिगत रूप से, मैं कभी भी बिल्डिंग का नीला रंग नहीं भूला, यहां तक कि तब भी जब मुझे देश निकाला दिया गया था. मैं इस बिल्डिंग का नीला रंग, इसकी संरचना, इसकी बनावट कभी नहीं भूल सका

...गलियारे की वो चमचमाती ज़मीन, धातु जैसी चमकीली धूसर ज़मीन…उन दरवाज़ों के खुलने और बंद करने की आवाज़… सैनिको का चलने और चाबियों की आवाज़, लगभग जितनी बार भी चाबियों की आवाज़ होती थी, आपको सोचने लगते थे कि वे किस कोठरी को खोलने जा रहे हैं या क्या कहीं वे मेरी कोठरी में तो नहीं आ रहे हैं? 

                                                    - मोलिफ़ि फ़ितो, बंदी, 1975
मोलिफ़ि फ़ितो, बंदी, 1975
जोहान्सबर्ग केंद्रीय पुलिस स्टेशन की 9 वी मंजिल का प्रवेश द्वार
सोवेतो विद्रोह, 16 जून 1976

जून 1976 सोवितो विद्रोह के मद्देनज़र, संदिग्ध व्यक्तियों को बिना किसी मुकदमें के कारावास भेजने के पुलिस के अधिकार बढ़ा दिए गए थे.

आंतरिक सुरक्षा संशोधन अधिनियम पास होने के बाद ऐसा किया गया था, जिसने न्यायधीश की अनुमति के बिना संदिग्ध व्यक्तियों को असीमित समयावधि के लिए कारवास भेजना संभव बना दिया.

'वे एक बिजली का जनरेटर लेकर आए और मुझे कपड़े उतारने को कहा और मैंने उनसे कहा कि मैं उन्हे स्वयं को यातना देने में सहायता नहीं करने वाला हूँ. अगर वह मुझे यातना देना चाहते थे, तो उन्हे सबसे पहले मुझे अचेत करके मेरे कपड़े उतारने होंगे....अंततः वे कुंठित हो गए और उन्होंने मुझे स्टील के फ़्रेम की कुर्सी से पीटना प्रारंभ कर दिया.

निसंदेह जब भी वे मारपीट करते थे, मेरी नाक, मुंह से पहले से खून बह रहा होता था, बस उन्हें क्रोधित करने के लिए, मैं अपना खून उनपर थूक देता था.

यह एक चाल थी जिसके बारे में ऐसा कहा जाने लगा था कि एक बार उन्हें गुस्सा आ जाने पर वे तार्किक रूप से और इतने पेशेवर तरीके से नहीं सोच पाते जितना की एक पूछताछकर्ता की तरह उन्हें सोचना चाहिए. एक बार गुस्सा आ जाने पर उनका खून खौल जाता था और जब तक वे मुझे मारने के लिए किसी भी चीज का इस्तेमाल नहीं कर लेते थे, तब तक वे मुझे मारते रहते थे.

                                                                                                                                  - ज़्वेलिंज़िमा सिज़ेन,  बंदी, 1976
ज़्वेलिंज़िमा सिज़ेन,  बंदी, 1976
जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन की छत से विहंगम दृश्य
जॉयस डिपेल. बंदी, 1976

'जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर... चार या पांच लोग और फिर उग्रता और उसके बाद बिजली का झटका, और न जाने क्या-क्या. मैं नहीं जानती… क्रोध में. उग्रता और यातनाएं, टकराव, सबकुछ. क्यों? मैं नहीं समझ पाती... ये यातना क्यों? जो भी हो, यह दुःखद है … और फिर मुझे क्रोध आता है इसलिए बात नहीं करती. यातनाएं क्यों? इसलिए मुझे बात नहीं करनी. बहुत क्रोध में हूं. बलात्कार या जो भी हो, मुझे परवाह नहीं. बस बात नहीं करनी.'

                                                                                         - जॉयस डिपेल. बंदी, 1976
जॉयस डिपेल के सहयोग से, क्लीव वैन डेन द्वारा बनाया गया आरेख, जो कारावास के दौरान उन पर हुई यातनाओं का चित्रण है

'मुझे तीस दिनों के लिए ऊपर कारावास में रखा गया और मैं वहां पच्चीस दिनों तक खड़ा रहा, दिन-रात. अट्ठाइस दिनों के बाद उन्होंने मुझे वहां से रिहा कर मेरी कोठरी में रखा. इसलिए आप कल्पना कर सकते हैं कि, अगर मुझे उस स्थान पर दोबारा जाना पड़ा, तो इससे मुझे वे डरावनी रातें याद आएगी जो पुलिस की यातनाओं के साथ मैंने बिताई थीं.'

                                                                         - सैनकी मोदियागोटला, बंदी, 1976
सैनकी मोदियागोटला, बंदी, 1976
जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन की 9 वीं मंजिल के गलियारे का दृश्य

'... वास्तविक आध्यात्मिक बोध के वो पल ... ये मेरे जीवनकाल में मेरे साथ घटे कुछेक पलों में से एक थे, उस पहली पूछताछ के बाद मुझे यहां लाया गया और मैं अपनी कोठरी में बिल्कुल अकेला हो गया...दीवारें हरी थीं और मुझे याद है उस चीज के आस-पास घूमना और पूरी तरह इस बात से सहमत होना कि हम जीतने जा रहे थे. 

कोई संदेह नहीं था, वे मुझे मार सकते थे, वे मेरे साथ कुछ भी कर सकते थे लेकिन हम संघर्ष जीतने जा रहे थे. यह विश्वास का एक अनोखा अनुभव था जिसने पूरे समय हर तरह से मेरा हौसला आश्चर्यजनक रूप से बनाए रखा था…'

                                                                                    - सेड्रिक मायसन, बंदी, 1976

वेलिंगटन शेज़िबेन - मृत्यु 11 दिसंबर 1976 

जोहान्सबर्ग के कार्लटन सेंटर में 7 दिसंबर 1976 को हुए एक विस्फोट के कथित सहअपराध के लिए गिरफ्तार किए जाने के बाद, 

वेलिंगटन शेज़िबेन, ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय का एक इंजीनियरिंग स्नातक, जॉन वोर्स्टर स्क्वेयर की कोठरी 311 में मृत लटका पाया गया. 

एक आधिकारिक जांच-पड़ताल, जो बहुत कुछ तिमोल की मृत्यु के बाद हुई पिछली जांच-पड़तालों के समान थी, ने पुलिस को किसी भी गलत कार्य से दोषमुक्त करार दिया.

 वेलिंगटन शेज़िबेन का 10 दिसंबर 1976 को सुरक्षा पुलिस को दिया गया बयान

एलमॉन मलेल - मृत्यु 20 जनवरी 1977

एलमॉन मलेल, जिन्हें 10 जनवरी 1977 को गिरफ़्तार किया गया था, की जोहान्सबर्ग के प्रिंसेस नर्सिंग होम में ब्रेन हेमरेज से मृत्यु हो गई. उन्होंने छः घंटे तक खड़े रहने (एक मानक यातना तकनीक) के बाद कथित रूप से अपना संतुलन खो दिया और अपना सिर एक मेज पर दे मारा, जिसके बाद उन्हें वहां ले जाया गया था.

इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी मृत्यु पुलिस की लापरवाही और हिंसा के कारण हुई, लेकिन एक बार फिर पुलिस को दोषमुक्त करार दे दिया गया. एक जांच-पड़ताल से पता चला कि मलेल की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से हुई.

सुरक्षा पुलिस की उस कार्यालय की फ़ोटोग्राफ़ जहां एलमॉन मलेल ने कथित रूप से अपना संतुलन खो दिया
फ़ोटो में वह जगह दिखाई गई है जहां मैबलेन ने अपनी मौत को दावत दी
उस कुर्सी की फ़ोटो जिस पर मैबलेन के पदचिह्न होने का दावा किया जाता है

मैथ्यूज़ मैबलेन - 15 फ़रवरी 1977

एलमॉन मलेल के ब्रेन हेमरेज के लगभग एक महीने बाद ही, मैथ्यूज़ 'मोजो' मैबलेन को सैन्य प्रशिक्षण के लिए जाने के संदेह में गिरफ्तार किए जाने के बाद उनकी मृत्यु जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर की 10वीं मंजिल से गिरने से हो गई. 

बाद में पुलिस ने दावा किया कि वे खिड़की पर चढ़ गए थे, और संतुलन खोने के कारण नीचे एक कार पर गिर गए. 

मैबलेन दक्षिण अफ़्रीका की जेल में मरने वाले 39वें व्यक्ति थे. 

मैबलेन जिस कार पर गिरे, उसकी फ़ोटो
फ़ोटो में वह कुर्सी दिखाई गई है जिसका उपयोग मैबलेन ने कथित तौर पर खिड़की पर चढ़ने के लिए किया था

'मेरे भाई मैथ्यू मारवेल मैलबेन जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर पुलिस मुख्यालय में फ़रवरी 1977 में पुलिस के हाथों मारे गए. इस बात का दावा किया गया था कि वह कुख्यात बिल्डिंग की दसवीं मंजिल से कूद गए और तत्काल उनकी मृत्यु हो गई. यह देखते हुए कि 10वीं मंजिल से कूदने की कहानियां कभी सच नहीं हुईं और न ही होंगी, हम जानना चाहते हैं कि हत्यारे सामने आकर अपने कृत्यों के लिए क्षमा क्यों नहीं मांगते. इन नृशंसताओं के दोषियों की इस चाल पर वास्तव में क्रोध आता है क्योंकि ये हत्यारे इन चीजों पर केवल तभी बोलना आरंभ करेंगे जब ये सामने आ जाएं - अन्यथा वे चुप्पी साधे रहेंगे. 

क्या वे वास्तव में सोचते हैं कि उनसे पीड़ित व्यक्ति उनके द्वारा पहुंचाए गए तकलीफ़ों को सीधे भूल जाएंगे? या वे सोचते हैं कि लोग अभी भी उनसे भयभीत हैं इसलिए उनकी कृत्यों के विषय में बात करने से पहले की तरह उनपर कुछ और मुसीबतें आ सकती हैं? परिवार और सगे-संबंधी मैथ्यूज़ के हत्यारों की चुप्पी से बहुत नाराज हैं. अब समय बीत रहा है. उन्हें सामने आकर कहानी बताने दें. हम भी उन्हें देखना चाहते हैं, वे कैसे दिखते हैं, क्या वे वास्तव में मनुष्य हैं और उनके परिवार, बच्चे, सगे-संबंधी और मित्र हैं.'

                                                                - TRC सामंजस्य पंजिका में श्री के.सी. मैबलेन की प्रविष्टि, 10 सितंबर 1998

'जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में हमेशा एक जैसे लोग थे. 

वे कैसे थे? वे व्यवसाय के जैसे थे. उनकी सीधी-सी सोच थी कि उन्हें हमें डराना था, हमें यातना देनी थी, हमसे पूछताछ करनी थी. 

हमें उन्हें सच बताना था. हमें उन्हें बताना था कि हमें कौन उकसा रहा था, कौन निर्देश दे रहा था. हमें उन्हें बताना था कि ANC में कौन हमें ऐसा करने के लिए निर्देश दे रहा था. अगर हम अस्वीकार करते तो हमें पीटा और धमकाया जाता था.'

                                                                       - पेनेलोप 'बेबी' त्वाया, बंदी, 1977
पेनेलोप 'बेबी' त्वाया, बंदी, 1977

'यह पाप का स्थान था, एक ऐसा स्थान जहां लोगों के साथ भयानक चीजें होती थीं ... यह एक ऐसा स्थान था जहां यातना दी जाती थी और यह सुरक्षा पुलिस का केंद्र था. इस स्थान पर दया नहीं की जाती थी यहां मूलतः विद्रोही लोगों को फांसी दे दी जाती थी.'

                                                                                     - बारबरा होगन, बंदी, 1981

'खिड़की पर कबूतरों की गुटरगूँ सुनना मधुर लगता था ... कोई भी ऐसी आवाज़ को सुनने का प्रयास करेगा और उससे मंत्रमुग्ध हो जाएगा जो जिंदा रहने की जुगत में जीवन का एक रूप दिखाती है.'

                                                                                     - बारबरा होगन, बंदी, 1981
जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन के बाहर कबूतरों का जमावड़ा
बारबरा होगन, बंदी, 1981
नील एगेट की मृत्यु के समय उनकी कोठरी की सामग्रियों की सूची [अफ़्रीकी भाषा में]

नील एगेट - मृत्यु 5 फ़रवरी 1982

डॉ. नील एगेट ने श्रमिकों के अधिकारों का समर्थन किया और अफ़्रीकी खाद्य एवं डिब्बाबंदी कर्मचारी संघ के आयोजक बने. उन्होंने, उच्च अधिकारियों से किसी व्यापार संघ से जुड़े श्रमिकों के अधिकार को मान्यता दिलवाने के लिए, फ़ैटिस और मोनिस के उत्पादों के बहिष्कार में केंद्रीय भूमिका निभाई. सरकार ने श्रमिकों को संगठित करने की उनकी क्षमता को खतरे के रूप में लिया और कहा कि वह एक साम्यवादी है. 

1981 में बड़ी संख्या में व्यापार संघ के नेताओं की सामूहिक गिरफ़्तारी के बाद, सुबह 3.25 पर एगेट अपनी कोठरी में फांसी पर लटके पाए गए. एगेट ने अपने मित्र द्वारा उनके लिए बुने गए एक स्कार्फ़ से स्वयं फांसी लगा ली. हालांकि, इस बार कारावास में हुए इस मृत्यु की सच्चाई जॉर्ज बिजॉस द्वारा किए गए एक मुकदमे के रूप में सामने आई जो काफी सुर्खियों में रहा, जिससे पता चलता है कि कैसे एगेट की मृत्यु से पहले उनसे की गई 80-घंटे की पूछताछ ने उन्हें भावनात्मक रूप से तोड़ दिया. फिर भी, पुलिस एक बार फिर बरी हो गई, क्योंकि दावा किया गया कि एगेट में लंबे समय से आत्मघाती प्रवृत्तियां थीं.

नील एगेट के विषय में न्याय मंत्री को दी जाने वाली रिपोर्ट को, 25 जनवरी 1982 को, कारावास में उनकी मृत्यु से दो सप्ताह से कम समय पहले ही पूरी किया गया था और इस पर बंदियों के निरीक्षक के हस्ताक्षर थे. 
बंदी अभिभावक समर्थन समिति (DPSC) द्वारा डॉ. नील एगेट की कारावास में मृत्यु पर जारी किया गया बयान

'यह एक खेल के जैसा था, अगर आप उनके द्वारा बनाए गए नियमों के साथ इसे पसंद करते थे और आपने उस सभी चीज़ों का प्रयास किया था जो आप कर सकते थे और उन नियमों को तोड़ा था या नियमों को विस्तृत किया था, लेकिन यह बात पूरी तरह साफ़ थी कि स्वयं हमारे द्वारा या किसी वकील के द्वारा कोई पहुंच अनुमत नहीं होगी और फिर हमने समान परिस्थितियों में रहने वाले दूसरे लोगों को सुना और हम इसके लिए क्या कर सकते हैं, यह जानने के लिए हमने एक-दूसरे से संपर्क करना प्रारंभ किया.

हम जल्दी ही जान गए कि वहां ऐसी चीजें थीं; ऐसे दबाव थे कि जो हम उन पर डाल सकते थे. और यह वह खेल था जिसे हमने आरंभ किया.'

                                   - मैक्स और ऑद्रे कोलमैन, पूर्व बंदी कीथ कोलमैन के माता-पिता, और DPSC के संस्थापक सदस्य 
जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में कारावास झेलते समय कोठरियों के बीच होने वाली बातचीत के बारे में पूर्व कैदी, जाबू नगवेन्या के विचार
जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में पूछताछ किए जाने और यातना दिए जाने के बारे में पूर्व बंदी, जाबू नगवेन्या के विचार

अर्नेस्ट मोआबी डिपेल - मृत्यु 8 अगस्त 1982

राजनीतिक रूप से सक्रिय परिवार के एर्नेस्ट डिपेल को एगेट की ही तरह नवंबर 1981 में गिरफ़्तार किया गया और कारावास में डाल दिया गया.

उसने मजिस्ट्रेट के सामने दिए एक बयान में मार-पीट और बिजली के झटके से दी गई यातना की शिकायत की. अंततः साढ़े तीन महीने बाद उन्हें छोड़ दिया गया.

5 अगस्त 1982 को उन्हें फिर से बंदी बनाया गया और जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर में रखा गया.

नील एगेट की मृत्यु के पांच महीने बाद, एर्नेस्ट डिपेल कोठरी में फांसी पर लटके पाए गए. उन्होंने एक फटे कंबल के टुकड़े से फांसी लगी ली थी.

डिपेल, जो अपनी मृत्यु के समय केवल 21 वर्ष के थे, ने बिजली के झटकों के प्रयोग सहित गंभीर मार-पीट और यातनाएं सहीं. 

डिपेल के बारे में मजिस्ट्रेट द्वारा न्याय मंत्री को लिखा गया पत्र

AC/2001/279 - ब्यूटाना ऑमोन्ड नोफ़ोमेला द्वारा TRC की आम माफ़ी समिति को दिए गए आवेदन से डिपेल को धोखे से ले जाने का सारांश

''आवेदक ने गवाही दी है कि उसे कैप्टन जैन कोएज़ी और लैफ्टिनेंट कूज वर्म्यूलेन से मोआबी डिपेल को सोवेतो स्थित उसके घर से पूछताछ के लिए अपहरण करने का निर्देश मिला था. इसमें जो ममसेला उसकी सहायता करने वाला था. वे उसकी बहन के विषय में जानकारी प्राप्त करना चाहते थे जो उनका अगला निशाना थी.

वे सोवेतो में उसके घर पहुंचे और पूछा कि वह मौजूद थे या नहीं. एक युवती ने बताया कि वह मौजूद नहीं थे लेकिन घर में घुसने पर उन्होंने उसे एक वार्डरोब के पीछे छिपा पाया गया. ममसेला ने उस पर आरोप लगाया कि उसने, उससे उधार लिया पैसा वापस नहीं किया. जिस कारण उसे उनके साथ चलने पर मजबूर होना पड़ा. 

वे उसे रूडपूर्ट ले गए जहां वे जैन कोएज़ी और वर्म्यूलेन से मिले. उसके बाद वे ज़ीरस्ट पहुंचे और निकट के एक फ़ार्म में गए जहां मोआबी से इस बात की पूछताछ की गई कि उसकी बहन जॉयस डिपेल कहां है. पूछताछ के दौरान उन लोगों ने उन्हें इतना मारा कि वह बेहोश हो गए. नोफ़ोमेला, ममसेला और वर्म्यूलेन ने उसकी पिटाई की थी. ग्रोबेलार और कोएज़ी ने इस पिटाई में भाग नहीं लिया. वह नहीं बता सका कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी मिली या नहीं जिससे उन्हें बोत्सवाना में जॉयस डिपेल पर किए गए अगले हमले में कोई सहायता मिली हो. 

इसके बाद वे लैकप्लास लौटे आए और वह नहीं कह सकता कि उसके बाद मोआबी डिपेल के साथ क्या हुआ. वह नहीं जानता कि उसे बंदी बनाया गया या छोड़ दिया गया. समिति संतुष्ट थी कि आम माफ़ी के लिए अपेक्षित शर्त पूरी हुई और नोफ़ोमेला को अक्टूबर 1981 के दौरान या इसके आसपास माओबी डिपेल के अपहरण और पिटाई संबंधी सभी अपराधों और दुष्कृत्यों के लिए माफ़ी दे दी गई.'

कैथेरीन हंटर, बंदी, 1983

'मुझे लगता है कि ‘वार्डरों' को सख्त निर्देश दिए गए थे, इसलिए वे निष्क्रिय, ढीली और बहुत कम थीं. वे बस खाना ले जाने का काम करती थीं. 

वे आंखों में आंखें डालकर नहीं देखती थीं और मुझे लगता है कि उन्हें बहुत आश्चर्य लगा कि एक श्वेत महिला ‘आतंकवादी’ थी, क्योंकि उनमें से कई अफ़्रीकी श्वेत महिलाएं थीं, इसलिए मैं संभवतः उनकी रूढ़िवादी सोच और आतंकवादी की प्रोफ़ाइल से मेल नहीं खाती थी.'

                                          - कैथेरीन हंटर, बंदी, 1983
हरी स्याही से बनाई गई जेल की कोठरी, कारावास के समय कैथरीन हंटर द्वारा बनाया गया चित्र
जैकी सेरॉक, बंदी, 1987

'बस एक बात जो आपको जिंदा रखती थी वह ये थी कि हमारी नैतिकता का स्तर काफी ऊंचा था. हम आज़ादी, लोकतंत्र के लिए लड़ रहे थे और यह एक अच्छा

कार्य था और फिर आप अपने आप से कहते हैं कि “मेरे साथ चाहे जो भी हुआ, कम से कम यह एक अच्छे कार्य की वजह से हुआ.” मुझे लगता है कि यही वह विशेष गुण था जो बाकी सब चीज़ों से ऊपर था.'

                                                                                                                                              - जैकी सेरॉक, बंदी, 1987

स्टैंज़ा बोपेप - मृत्यु 5 जून 1988

बार-बार बिजली के झटके दिए जाने के बाद, “अचानक” दिल का दौरा पड़ने से कार्यकर्ता स्टैंज़ा बोपेप की मृत्यु हो गई. कारावास में हुई दूसरी मौत से पुलिस की छवि पर बहुत बुरा असर पड़ेगा, इस बात को ध्यान में रखते हुए दावा किया गया कि बोपेप वास्तव में हिरासत से भाग गए थे. 

हालांकि, 1997 में ट्रूथ एंड रिकन्सिलीएशन कमीशन की सुनवाई के दौरान आखिरकार पुलिस ने स्वीकार किया कि बोपेप की मृत्यु कारावास में ही हुई थी और उनकी लाश को मोज़ैम्बिक की सीमा पर कोमाती नदी में फेंक दिया गया था.

स्टैंज़ा बोपेप की लाश कभी नहीं मिली.

30 जनवरी 1990 - क्लेटन सिथोल की कारावास में मृत्यु हो गई

नेल्सन मंडेला के जेल से छूटने के केवल 2 दिन पहले, 20 वर्षीय क्लेटन सिथोल अपनी कोठरी में मृत लटके पाए गए. 

आत्महत्या से पहले, सिथोल ने कथित रूप से विन्नी मंडेला और उनकी बेटी ज़िंज़ी के खिलाफ आपराधिक आचरण का ठोस सबूत दिया था. सिथोल, वास्तव में, नेल्सन मंडेला के एक नाती के पिता थे.

1990 में नेल्सन मंडेला की रिहाई के बाद, देश के सुरक्षा कानूनों में व्यापक परिवर्तन किए गए.

 संवैधानिक पुस्तकों से बिना मुकदमे का कारावास को हटा दिया गया था. 1991 में सुरक्षा शाखा को अनिवार्य रूप से भंग करके, उसे आपराधिक जांच विभाग की एक इकाई 'क्राइम कम्बैटिंग एंड इनवेस्टिगेशन' बना दिया गया और 1995 में, दक्षिण अफ़्रीकी पुलिस सेवा प्रारंभ की गई. 

ट्रूथ एंड रिकन्सिलीएशन कमीशन की रिपोर्ट में कारावास में हुई पचहत्तर मौतों का आधिकारिक रिकॉर्ड है. इस बात के स्पष्ट प्रमाण के बावजूद कि पुलिस बंदियों को यातना दे रही थी, कारावास में किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के लिए एक भी पुलिसकर्मी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया.

'वे लोग जो उस समय इन चीजों में शामिल थे, अब उनके लिए अपराधबोध और जिम्मेदारी महसूस कर रहे हैं और अपनी सार्वजनिक छवि बदलने के लिए - अपने पूर्व-बंदियों से समर्थन मांग रहे हैं क्योंकि केवल वही समझ सकते हैं कि वास्तव ऐसा क्यों हुआ था.  

यह बहुत दिलचस्प बात है कि, दोषी अपने पीड़ितों को इसके विषय में समझाने का प्रयास कर रहे हैं. मुझे लगता है कि बंदियों को कारावास से बाहर रहने वाले लोगों से अधिक अच्छी तरह पता था कि क्या चल रहा था. यह एक युद्ध था और वह इसका महत्वपूर्ण हिस्सा था…'

              - डॉ. एलिज़ाबेथ फ़्लॉएड, पूर्व बंदी, 1981 - 1992, और नील एगेट की प्रेमिका
जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर को नया नाम देना, 1997. (SABC के सौजन्य से)

1997 में, कुख्यात जॉन वॉर्स्टर स्क्वेयर के उपकक्ष से बी.जे. वोर्स्टर की कांस्य की अर्ध-प्रतिमा हटा दी गई. 

इसे नया नाम दिया गया - जोहान्सबर्ग सेंट्रल पुलिस स्टेशन और अब यह जोहान्सबर्ग में अपराध के विरूद्ध कार्य करता है. 

इन परिवर्तनों के बावजूद, आंतरिक भागों का सूनापन और सीलन की गंध अभी भी वही है. इसके पूर्व-निवासियों की आत्माओं को अभी तक यहां से निकाला नहीं जा सका है.

...यह आंदोलन की याद है और अगर यह आगे बढ़ता है, तो किसी भी व्यक्ति को यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि वह स्थान कैसा दिखता था...क्योंकि वे चीज़ें यह दिखाती करती हैं कि उन्होंने हमें नुकसान पहुंचाने के लिए क्या किया, क्योंकि अधिकांश लोगों की इस सिस्टम से हानि हुई और अगर आप चीज़ों को इस तरह से लेते हैं, तो आप कहानी का एक बड़ा भाग खो देते हैं...

                                                                                                                               - मोलफ़े फ़ितो, बंदी, 1975
जोहांसबर्ग केंद्रीय पुलिस स्टेशन का प्रवेश द्वार, 2007
आभार: कहानी

Curator — Catherine Kennedy (SAHA)
Archivist — Debora Matthews (SAHA)
Photographs — Craig Matthew (Doxa Productions)
Archival video footage — South African Broadcasting Corporation (SABC)
Background — This exhibit is based on the interactive DVD, 'Between life and death: stories from John Vorster Square', developed by Doxa Productions on behalf of SAHA in 2007, as part of the SAHA / Sunday Times Heritage Project, funded by the Atlantic Philanthropies. Please see DVD for full research and image credits. For more information about the SAHA / Sunday Times Heritage Project, please visit sthp.saha.org.za 

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