1950 - 1989

दीवार का गिरना: क्रांति नहीं रहस्योद्घाटन

"“रॉक संगीत, वीडियो, नीली जींस, फ़ास्ट फ़ूड, समाचार नेटवर्क और टीवी उपग्रहों में संपूर्ण लाल सेना की तुलना में अधिक शक्ति है.”"
रेज़िस डिब्रे / 1986

नवम्बर 1989 में बर्लिन की दीवार क्यों गिर गई?

पश्चिमी टेलीविज़न पर फ़ोटो यह संकेत करती थीं कि 1989 में कम्युनिस्ट प्रणाली का टूटना, स्वतंत्रता और लोकतंत्र के लिए लोगों की लालसा का एक परिणाम था. कुछ इतिहासकारों का दावा है कि यह अन्य राजनैतिक व्यवस्थाओं पर पश्चिमी लोकतंत्र की अंतिम जीत थी. लेकिन समय के गुज़रने के साथ-साथ हमें ज्ञात हुआ कि 1989 की घटनाएं अधिक पश्चिम की विजय और लोकतंत्र के लिए लोगों के विद्रोह की तुलना में एक मृत प्रणाली के पतन का अधिक प्रतिनिधित्व करती हैं.  

बर्लिन में समारोह
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बर्लिन की दीवार गिरने का ऐतिहासिक महत्व क्या था? क्या हम, जैसा कि फ्रांसिस फुकुयामा ने कहा था, इतिहास के अंत तक पहुँच गए थे?

यह निःसेदह इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, जो न केवल 1945 से यूरोप पर वर्चस्व वाले शीत युद्ध की समाप्ति का संकेत था, बल्कि उस साम्यवादी प्रणाली के अंत का भी, जिसने1917 से रूस पर शासन किया. 

संपूर्ण पूर्वी यूरोप और रूस में शासन प्रणाली में परिवर्तन शुरू हो रहा था, क्योंकि देशों ने सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर ली थी. 

"हम जो संभवतः देख रहे हैं वो केवल शीत युद्ध की समाप्ति या युद्ध के बाद के इतिहास की विशेष अवधि का गुजरना नहीं होगा, बल्कि वो इतिहास का अंत जैसा होगा: अर्थात, मानव सरकार के अंतिम रूप में मानव जाति के वैचारिक विकास और पश्चिमी उदार लोकतंत्र के सार्वभौमिकरण का अंत."

फ्रांसिस फुकुयामा द्वारा रचित 'The End of History & The Last Man'
पश्चिम का पतन? सोवियत संघ को लाभ
1961 में तंजानिया की स्वतंत्रता

जैसे-जैसे उपनिवेशवाद की समाप्ति ने अफ़्रीका और एशिया में यूरोप के नियंत्रण का अंत किया, वैसे-वैसे नए देश उभर कर सामने आए. शाही शासन के विरुद्ध विद्रोह का समर्थन करने के कारण सोवियत संघ को इस प्रक्रिया का लाभ मिला. ये देश बार-बार शीत युद्ध के लिए युद्धभूमि बने, उदाहरण के लिए दक्षिणी वियतनाम में सोवियत संघ ने वियतकॉन्ग का समर्थन किया.

अप्रैल 1968 में वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिकी मरीन
सोवियत संघ ने वियतकॉन्ग का समर्थन किया था
सोवियत शक्ति और बड़े हथियारों की दौड़

"1950 के दशक में, ऐसा लगा जैसे दुनिया काफी हद तक सोवियत के नक्शेकदम पर चल रही थी"

सोवियत संघ सैन्य और भारी औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में सक्षम और सफल हो गया; इसके परिणामस्वरूप CIA ने सोवियत संघ की क्षमताओं का अधिक अनुमान लगाया - यह भी अनुमान लगाया गया कि वर्ष 2000 तक सोवियत संघ का GDP, अमेरिका से 3 गुना अधिक हो सकता है.  

सेवियत संघ को कई वैज्ञानिक प्रगतियों, जैसे कि रॉकेट और उपग्रहों का लाभ मिला. ये प्रगतियां अक्सर द्वितीय विश्वयुद्ध से प्राप्त हुए ज्ञान का परिणाम हुआ करती थीं
आधुनिक मशीनरी का उपयोग करके कज़ाखस्तान में एक सामूहिक फ़ार्म का निर्माण किया गया है
1961 में मास्को में क्रांति परेड की वर्षगांठ

फिर भी सोवियत सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में अमेरिकी GDP जितनी तेज़ी से वृद्धि नहीं हुई और सोवियत संघ को मिसाइल और थल सेना में अमेरिका की बराबरी करने के लिए दोगुना व्यय करना पड़ा. इस प्रकार का खर्चा स्थायी तो नहीं था लेकिन पश्चिमी शक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने की अपनी क्षमता दिखाने हेतु सोवियत के लिए आवश्यक था.

1960 में मे डे परेड के प्रदर्शन में सोवियत सैन्य कौशल
1958 के मे डे समारोह की परेड में रूसी सैन्य अधिकारी

इसके अतिरिक्त, दोनों महान शक्तियों ने 'अंतरिक्ष की दौड़' को जीतने के लिए अत्यधिक धन व्यय किया. 1957 में पहले उपग्रह "स्पूतनिक" (नीचे) को अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित करने पर ऐसा लगा की सोवियत संघ आगे निकल गया है.

साम्यवाद और उपभोक्तावाद का मिलन - रसोई वाद-विवाद
रेफ़्रीजरेटर, पश्चिमी प्रगति में एक मील का पत्थर
सोवियत संघ में श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए जीवन कठिन था
रसोई वाद-विवाद
1959 की अमेरिकी राष्ट्रीय प्रदर्शनी में निकिता क्रुश्चेव्ह और वीपी रिचर्ड निक्सन
हथियारों की दौड़ से नई उपभोग प्रतिस्पर्धा में परिवर्तन एक ऐसी लड़ाई थी जिसे जीतने के लिए अमेरिका आश्वस्त था

सोवियत संघ के विपरीत दावों के बावजूद, सोवियत संघ में जीवन स्तर, अमेरिका की तुलना में इतना नीचे था कि वह 1920 के दशक के अमेरिकियों को भी चौंका दे.

सोवियत संघ में किराने की दुकानों के सामने कतारें लगना आम बात थी
सोवियत कर्मचारियों का जीवन स्तर अपने पश्चिमी समकक्षों की तुलना में काफी नीचे था

सोवियत प्रधानमंत्री निकिता क्रुश्चेव्ह ने स्वीकार किया कि प्रचार सबसे महत्वपूर्ण था. उन्होंने इस बात पर ज़ोर देना सुनिश्चित किया कि सोवियत संघ ऐसी किसी भी चीज़ का उत्पादन कर सकता था जिसका उत्पादन अमेरिका कर सकता था और साथ ही वह नई खोज में भी बहुत आगे था. 

सोवियत संघ निश्चित रूप से भारी औद्योगिक माल के उत्पादन में सफल था
नीली जीन्स और उपभोक्तावाद

जीवन स्तरों में अंतर बहुत गहरा था. यहां तक की सोवियत संघ के किशोरों ने पश्चिम में हुए फ़ैशन और जीवनशैली के परिवर्तनों को समझना शुरु कर दिया था. उनमें से कई पश्चिम के फ़ैशन को अपनाना चाहते थे, लेकिन नीली जीन्स वाली जीवनशैली की नकल करना लगभग असंभव था. सोवियत संघ कभी भी स्वयं जीन्स का उत्पादन नहीं कर पाया, बावजूद इसके कि ये 'कर्मचारियों' का परिधान था.

सोवियत संघ में एक कर्मचारी का जीवन, अमेरिका में जीवन से बहुत अलग था
अमेरिका में निर्माण समय के साथ आधुनिक होते जा रहा था
आधुनिक अमेरिकी गृहिणी के लिए रसोई के उपकरण
पोलरॉइड कैमरा एक क्रांतिकारी नया उपकरण था
अमेरिका में उपनगरीय जीवन

20 वीं सदी के दौरान, कैमरा से लेकर कार से लेकर जीन्स जैसी नई खोजों के साथ अमेरिका आगे बढ़ गया.  

मूल दोष: नियोजित अर्थव्यवस्था

सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था मौलिक रूप से दोषपूर्ण थी: यह उपभोक्ता मांग के परिवर्तनों, संबंधित कीमतों या उत्पादन के परिवर्तनों से तालमेल नहीं बिठा सकी. सबसे अनुकूल तरीके से संसाधनों का आवंटन करने के लिए नियोजकों के पास कभी भी पर्याप्त जानकारी नहीं होती थी. सिस्टम में शुरूआत से ही खराबी थी और उसे संभाल पाना लगभग असंभव कार्य था.

मास्को के खाद्य बाजार में कतारें लगना आम बात थी

जब 1970 के दशक में तेल की कीमतों में वृद्धि हुई, तो सोवियत संघ को पता लगा कि इसका राजस्व प्रवाह कुछ इस तरह का है, जिसका उपयोग वह अपनी अर्थव्यवस्था को जीवंत बनाए रखने और अमेरिका से प्रतिस्पर्धा करने के लिए कर सकता है.

सोवियत संघ की नियोजित अर्थव्यवस्था मौलिक रूप से दोषपूर्ण थी - अगर तेल की कीमत ऊंची नहीं होती, तो सोवियत संघ जल्द ही ढह जाता.

बाकू, अज़रबैजान में तेल के कुएं
रोमानिया में तेल के कुएं
उफ़ा में एक रिफ़ाइनरी.
1979: एक बड़ा मोड़?

1979 उथल-पुथल भरा वर्ष था, शायद 1989 से भी अधिक. ईरानी क्रांति, चीन में आर्थिक सुधारों की शुरुआत, मार्गरट थेचर का ब्रिटेन की सत्ता में आना और अफ़गानिस्तान पर सोवियत संघ का हमला, इन सभी घटनाओं ने बदलती दुनिया का संकेत दिया.

सुधार और क्रांति

जब मिखाइल गोर्बाचेव सत्ता में आए, तो उन्हें लगा कि सोवियत संघ को बदलना होगा. उन्होंने सोवियत संघ को मजबूत बनाने के उद्देश्य से दो योजनाएं आरंभ की: पेरेस्त्रोइका (समाज का पुनर्गठन) और ग्लासनोस्ट (पारदर्शिता).

पेरेस्त्रोइका: आर्थिक पुनर्गठन, जो हालांकि कभी सफल नहीं रहा. अर्थव्यवस्था में वापस गिरावट आई और आर्थिक समस्याएं बिगड़ गईं.

ग्लासनोस्ट: सोवियत संघ के लोगों के लिए नई पारदर्शिता और नया खुलापन. हालांकि गिरती हुई अर्थव्यवस्था के साथ मिलकर, ग्लासनोस्ट ने उस विरोध और श्रृंखलाबद्ध प्रतिक्रिया को और फैलाया जिसके ऊपर पार्टी का कोई नियंत्रण नहीं था. नई-नई मिली यह 'स्वतंत्रता' अंततः चारों ओर फैल गई जो संपूर्ण सोवियत संघ में एक क्रांति के समान थी. 

पेरेस्त्रोइका का उद्देश्य सोवियत अर्थव्यवस्था का रुख मोड़ना था
बुल्गारिया में गोर्बाचेव: ग्लासनोस्ट का उद्देश्य राज्य में भ्रष्टाचार से निपटना था लेकिन ऐसा करने की बजाय इसने राज्य में विरोध प्रदर्शनों की श्रृंखलाबद्ध घटनाओं और असंतुष्टि की घोषणाओं को जन्म दिया

सिनात्रा सिद्धांत ("मेरा तरीका") ने पूर्वी यूरोप के देशों को "उनके तरीके" अपनाने की अनुमति दे दी. यह पूर्व विरोधी सरकार के व्यवसाय और दबाव के परिणाम स्वरूप एक नाटकीय परिवर्तन था, उदा., 1950 के दशक में चेकस्लोवाकिया जैसे देशों के माध्यम से सोवियत टैंक.

ग्लासनोस्ट के साथ मिलकर सिनात्रा सिद्धांत के परिणामस्वरूप और समस्याएं हुईं. नवंबर 1989 से काफी समय पहले बाल्टिक राज्य, हंगरी, पोलैंड यहां तक की बर्लिन में भी सोवियत संघ का विघटन पूरी तरह सुनिश्चित हो गया था. गोर्बाचेव और उनकी पार्टी नियंत्रण खो रही थीं.

सोवियत संघ का विघटन अधिक स्पष्ट होता जा रहा था
1968 में चेकस्लोवाकिया पर सोवियत आक्रमण के विपरीत, बागडोर अब सोवियत संघ के हाथ में नहीं थी
अक्टूबर 1989 में पूर्वी जर्मनी की सरकार के विरोध में 90,000 लोगों ने लीप्ज़िग में प्रदर्शन किया
निष्कर्ष

बर्लिन की दीवार का गिरना उन घटनाओं का परिणाम था जो पूरे 1989 में पूर्वी यूरोप का विकास कर रही थीं; यह एक मृत सिस्टम का तर्कसंगत निष्कर्ष था जो व्यर्थ ही स्वयं को सुधारने का प्रयास कर रहा था. 

1989 में चेकपॉइंट चार्ली
पूर्वी बर्लिन के लोगों ने 31 दिसंबर 1989 को शरह के बंटवारे की समाप्ति का उत्सव मनाया

बर्लिन की दीवार के गिरने को पश्चिम की जीत या "इतिहास का अंत" के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. एक क्रांति की बजाय यह एक रहस्योद्धाटन है: इसने खुलासा किया कि नियोजित अर्थव्यवस्थाएं वास्तव में कितनी बुरी तरह कार्य करती हैं.पूर्वी यूरोप के लोग भी वास्तव में लोकतंत्र और स्वतंत्रता से अधिक एक आरामदायक जीवनशैली चाहते थे, जो एक नियोजित अर्थव्यवस्था नहीं दे सकी.

हालांकि, इस सिस्टम के पतन ने द्विध्रुवीय विश्व के अंत का संकेत दिया, जिसे आसानी से समझा जा सकता था. आज, 23 वर्षों बाद, दुनिया और भी जटिल बन गई है. एक नई महाशक्ति उभर कर सामने आती नज़र आ रही है - चीन - और रूसी संघ सहित कई अन्य शक्तियां अभी भी दुनिया पर एक शक्तिशाली प्रभाव डालती हैं.

आभार: कहानी

Curator — Niall Ferguson, Laurence A. Tisch Professor of History at Harvard University
www.niallferguson.com

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