शर्पविल हत्याकांड

Africa Media Online

रंगभेद नीति विरोधी अहिंसात्मक अभियान यहां शुरू हुआ था.
ड्रम, अक्टूबर 1960 से ली गई रिपोर्ट

"अफ़्रीका के लोग इसी मौके की प्रतीक्षा कर रहे थे! सोमवार, 21 मार्च 1960 को हम इस देश में व्याप्त पास संबंधी कानूनों के विरोध में हमारे सकारात्मक, निर्णायक आंदोलन का शंखनाद करेंगे." यह वाक्य शार्पविल के तीन दिन पहले मैंगेलिसो सोबुक्वे के थे. दक्षिण अफ़्रीका ने अपने इतिहास की नई कहानी लिखना शुरू कर दी थी.

तीन दिन बाद पैन-अफ़्रीकनिस्ट नेताओं ने रंगभेद के विरुद्ध अपने अहिंसात्मक आंदोलन की शुरुआत कर दी थी. पुलिस कमीश्नर को लिखे एक पत्र में मैंगालिसो सोबुक्वे ने अपने विचार स्पष्ट करते हु्ए बताया कि: "मैंने अपने संगठन के सदस्यों को ही नहीं बल्कि सामान्य अफ़्रीकी जनता को भी कड़े निर्देश दिए हैं कि वे किसी के भी बहकावे में आकर किसी हिंसात्मक कार्रवाई का हिस्सा न बनें."

और इसलिए ही नियोजित दिन, अर्थात सोमवार 21 मार्च को हज़ारों पैन-अफ़्रीकनिस्ट लोग अपने अनुमति पत्रों के बिना पुलिस के सामने आए और गिरफ़्‍तारी की मांग की. वे संगठित अहिंसा की ताकत का असर दिखाना चाहते थे. वे लोग अपने इस लंबी लड़ाई के पहले कदम के रूप में पास संबंधी कानूनों को अकार्यशील बनाना चाहते थे, ताकि 1963 तक अफ़्रीकी लोगों को "आज़ादी और स्वतंत्रता" मिल जाए.

गिरफ़्तारी की मांग करने वाले स्वयंसेवकों की भीड़ को देखकर पुलिस को कुछ समझ नहीं आया. कुछ स्थानों पर नेताओं को बंधक बनाया गया, कहीं पर उन्हें वापस लौट जाने के लिए मनाया गया. सब कुछ योजना के अनुसार हुआ और फिर शार्पविल में एक दुःखद घटना हो गई.

हत्याकांड शुरू होने के ठीक पहले नारे लगाते अफ़्रीकियों की भीड़ के बीच से गुज़रता एक सारासेन
कुछ ही मिनटों बाद इनमें से कुछ लोग मृत पड़े थे
मृत लोगों के पास शोक मनाते लोग
गोलीबारी से घबड़ाहट में भागती भीड़
बीमार लोगों की मदद की गई 
यह आधिकारिक घोषणा की गई कि पुलिस द्वारा भीड़ पर गोलियां चलाने के बाद 67 अफ़्रीकियों की मौत हो गई और 186 घायल हो गए.
हालांकि पास-विरोधी अभियान की अगुवाई PAC ने की थी, फिर भी ANC के अध्यक्ष एल्बर्ट लुथुली ने 28 मार्च को अफ़्रीकी लोगों के लिए शोक का दिन बताया. PAC नेताओं ने इस कदम का समर्थन किया और अफ़्रीकी लोग भी एकमत हुए.

शर्पविल में हुई हत्याओं के बाद, 20,000 लोगों को बंधक बनाए जाने के बाद, उस भयावह स्वप्न के 156 दिनों बाद लोगों के विरोध पर, सरकार ने हमारे देश के इतिहास का एक और अध्याय बंद कर दिया. इसमें कोई बदलाव नहीं होना था. रंगभेद और दमन की राजनीति कहीं नहीं जाने वाले थे.

आभार: कहानी

Text — Drum Magazine / Baileys African History Archive and Africa Media Online
Photographic archive — Baileys African History Archive

क्रेडिट: सभी मीडिया
कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि पेश की गई कहानी किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष ने बनाई हो और वह नीचे दिए गए उन संस्थानों की सोच से मेल न खाती हो, जिन्होंने यह सामग्री आप तक पहुंचाई है.
Google अनुवाद करें
मुख्यपृष्ठ
एक्सप्लोर करें
आस-पास
प्रोफ़ाइल