माेने: गांव और खूबसूरत नज़ाराें वाली शैली

The National Gallery, London

द नैशनल गैलरी, लंदन

माेने का नाेर्मंडी से रिश्ता
पेरिस में पैदा हुए माेने (1840–1926) नाेर्मंडी में पले-बढ़े थे. उत्तरी फ़्रांस के इलाके नाेर्मंडी का मध्यकालीन इतिहास काफ़ी समृद्ध है, साथ ही यहां कई एेतिहासिक इमारतें अाैर सुंदर ग्रामीण इलाके हैं

अपनी जवानी के दिनाें में उन्हाेंने लैंडस्केप पेंटिंग की ‘खूबसूरत नज़ाराें वाली शैली’ काे समझ लिया. इस शैली की शुरुअात 18वीं शताब्दी के इंग्लैंड में हुई थी. इसमें ग्रामीण माहाैल में बनी पुरानी इमारताें की खूबसूरती पर खास ध्यान रहता है. माेने ने अपने पूरे करियर में नाेर्मंडी के समुद्री किनाराें, ग्रामीण इलाकाें अाैर गांवाें काे अपनी पेंटिंग में उतारा. बीच-बीच में वह घर से दूर जगहों पर जाकर वहां की भी पेंटिंग बनाते रहते थे.

नीदरलैंड्स
माेने जब घर से दूर होते थे, तब भी उनकी आंखें अक्सर अपने घर के आस-पास जैसे खूबसूरत नज़ाराें की तलाश करती रहती थीं. उन्होंने दक्षिणी फ़्रांस, लंदन, वेनिस अाैर नीदरलैंड्स में ऐसे ही नज़ारे ढूंढे और उनकी खूबसूरती को अपनी पेंटिंग में दिखाया.

1871 में अपने करियर की शुरुअात के दाैरान माेने, ऐम्सटर्डैम के उत्तर में स्थित ज़ांदाम शहर में चार महीने रहे थे.

कुछ साल बाद, वह ऐम्सटर्डैम घूमने के लिए फिर से नीदरलैंड्स अा गए.

दूसरे सैलानियाें की तरह, माेने काे भी हॉलैंड के रंग-बिरंगे घराें अाैर पवन चक्कियाें ने खूब लुभाया. इनके अलग-अलग रंगाें अाैर अाकाराें की कशिश काे उन्हाेंने अपनी पेंटिंग में बेहद खूबसूरती के साथ दिखाया है.

वैथी
सितंबर 1878 में, माेने अपनी पत्नी अाैर छाेटे बच्चाें के साथ नाेर्मंडी के गांव वैथी चले गए, जाे कि पेरिस से 90 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम में सेन नदी के किनारे है.

माेने ने वहां एक घर किराये पर लिया अाैर गांव की अलग-अलग जगहाें की पेंटिंग बनाईं. इनमें, उन्हाेंने 13वीं शताब्दी में बने राेमन शैली के एक शानदार चर्च अाैर अास-पास के ग्रामीण इलाकाें काे बखूबी दिखाया है. (ऊपर दिए गए स्ट्रीट व्यू में, अाप वह जगह देख सकते हैं, जहां बैठकर माेने चर्च की पेंटिंग बनाया करते थे).

उन्हाेंने बसंत से लेकर सर्दी तक हर माैसम में इस इलाके की पेंटिंग बनाईं. वह ज़्यादातर बाहरी नज़ाराें की पेंटिंग बनाना पसंद करते थे. एेसा करते वक्त, वह इस बात का ध्यान रखते थे कि माैसम अाैर राेशनी के रंग उनकी पेंटिंग में अच्छी तरह से उतरें.

वेरंजिविल
1880 के बाद भी माेने ने फ़्रांस में घूमना जारी रखा. 1882 में उन्हाेंने नाेर्मंडी से लगे समुद्री किनारे पर दाे बार काफ़ी लंबा वक्त बिताया. यह जगह डिएप बंदरगाह के पश्चिम में स्थित है.
वेरंजिविल में उन्होंने 16वीं शताब्दी में बने छोटे से सेंट वलेरी चर्च और समुद्र के सामने स्थित एक कॉटेज की पेंटिंग कई बार बनाईं. इन पेंटिंग में आस-पास की हरियाली के रंग की वजह से कॉटेज की ईंटों का लाल रंग काफ़ी उभर के आया. समुद्र के किनारे बनी ये इमारतें वैसे तो काफ़ी सुंदर हैं लेकिन सालों तक मिला प्रकृति का साथ इन्हें और भी खूबसूरत बनाता है. मोने की इन पेंटिंग काे देखकर, हर कोई इनसे जुड़ा हुआ महसूस करता है.
द रिविएरा
अपनी पेंटिंग के लिए अच्छी रोशनी की तलाश में मोने फ़्रांस और इटली के रिविएरा तक गए. भूमध्यसागर तक पहुंचने में मोने को यूरोपियन रेल नेटवर्क का काफ़ी फायदा मिला, जो उस वक़्त तेज़ी से बढ़ रहा था.

1884 में समुद्र के किनारे पेंटिंग बनाने के दौरान मोने का मन सीमा पार इटली के खूबसूरत नज़ारों ने मोह लिया. ऐसे ही नज़ारों में से था, डोलचिआवा स्थित 15वीं शताब्दी में बना पुल (तस्वीर में दिखाया गया).

जिवर्नी
1890 के दशक में मोने ने जिवर्नी स्थित अपने घर के लिए फूलों और तालाब वाला बगीचा डिज़ाइन किया और फिर उसे बनाया. यह बगीचा अब काफ़ी मशहूर है.

बागवानी का शौक रखने वाले मोने ने यह बगीचा इसलिए बनाया क्योंकि वह एक ऐसी जगह चाहते थे, जो खूबसूरत लगे और जिसकी पेंटिंग भी बनाई जा सके. मोने ने तालाब वाला बगीचा बनाने के लिए, सेन नदी से निकलने वाली एप्ट नदीकी धारा को अपने घर की तरफ़ मोड़ा. ऐसा करने से मोने के घर के पास बने रेलवे ट्रैक वाली दलदली ज़मीन, तालाब वाले बगीचे में बदल गई. इस पर मोने ने जापानी स्टाइल का एक खूबसूरत पुल भी बनाया. तालाब वाला बगीचा बनाने के बाद, माेने ने ज़्यादातर पेंटिंग इसी जगह की बनाईं, यह सिलसिला 1926 में मोने के निधन तक चलता रहा.

क्रेडिट: सभी मीडिया
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