मई 1968

मई 68 और इतिहासकार

मौखिक इतिहास के बारे में

मुद्दा

 

2010 में प्रकाशित और एक विशेष समूह, मुख्य रूप से इतिहासकारों के मौखिक अनुभवों पर आधारित पुस्तक – Agnès Callu (ed.), "Le Mai 68 des historiens : entre identités narratives et histoire orale" (मई 68 और इतिहासकार: कथा अभिज्ञान और मौखिक इतिहास के बीच) – का उद्देश्य शोध उपकरणों, इतिहास के नवीनीकरण का संचालन और ज्ञान के प्रसार की योजनाओं की सहायता से मई 1968 की घटनाओं की तह तक पहुंचना है. रिकॉर्ड की गई जीवनियों या कुछ मामलों में चित्र के रूप में दर्ज इन सबूतों का विश्लेषण करके, यह पुस्तक "बुद्धिजीवियों" द्वारा इन घटनाओं के प्रभाव के बारे में पहले दिए गए तर्कों को समझने का प्रयास करती है जिनके कारण महत्वपूर्ण बदलाव हुए. यह सामाजीकरण के रूप का व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों स्तरों पर गहराई से जांच करती है. यह बताती है कि किस प्रकार सामाजिक कल्पनाएं किसी विशेष व्यक्ति या पीढ़ीगत समूह को जकड़े होती हैं. यह इतिहासकारों की व्याख्याओं और राजनीतिकृत आदर्श सिद्धांतों के बीच सम्मिलन, विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा में किए गए बदलावों तथा 1970 के दशक में सामाजिक विज्ञानों की अवधारणाओं और विनियोग का निर्धारण या पुनर्निधारण करने वाले नियमों पर भी चर्चा करती है.

पद्धति: सेमिनार पर आधारित एक पुस्तक

 

मुख्य रूप से (मई 68 और इतिहासकारों के बीच प्रतीकात्मक सिस्टम के समाज विज्ञान के दोहरे मुद्दे पर आधारित) यह पुस्तक उस अनुसंधान सेमिनार की प्रगति रिपोर्ट की तरह कार्य करती है, जिसने सामाजिक-ऐतिहासिक, इतिहास लेखन संबंधी और प्रक्रियात्मक स्तर पर चिंतन और उपयोग के लिए फ़्रेमवर्क निर्धारित किया है. सेमिनार ने विधि (मौखिक इतिहास) और विषय (मई 68) के सह-विकास को कुछ इस प्रकार दोहराया जिससे विस्तारित और सम्मिलित शिक्षण द्वारा अपनाए गए रास्ते की फ्रांसीसी और अंतर्राष्ट्रीय दोनों संदर्भ में जांच हो जाए, साथ ही साथ किसी ऐसे विषय के इतिहासलेखन की जांच हो जाए जो समाचार का हिस्सा होने से लेकर इतिहासकारों की रुचि बन जाता है. फिर हस्तक्षेप के विचार की जांच की गई और पद्धति को डोमेन पर लागू किया गया – क्या मई 68 को मौखिक इतिहास के माध्यम से समझना संभव है जबकि यह ऐसे इतिहासकारों द्वारा कहा जा रहा हो जो स्वयं घटना के साक्षी थे?

ज़ैक्स ली गौफ़ का कथन

"[…] 68 में, मैं 40 वर्ष का था. मैं हर मीटिंग में जाया करता था. मैं मोर्चे पर नहीं गया, लेकिन अगर मैं 20 का होता, तो शायद मोर्चे पर गया होता. हर हाल में, मैं हमेशा वहां मौजूद था. मुझे लगता है कि मैं भी सहानुभूति, आशा और धोखे के उसी मेल का अनुभव करता. मैं 1968 में 20 वर्ष का होना नहीं चाहता, लेकिन उस समय मैंने स्वयं को सबल महसूस किया, मानो कि मैं एक युवा था [...]"

ज़ैक्स डुपाकिए का कथन

" […] मुझे इतिहास बारुद के ढेर के जैसा प्रतीत हुआ और समस्या यह जानना था कि क्या कोई सिगरेट जलाने वाला है या इस ढेर को चिंगारी देने वाला है. दूसरे शब्दों में, यह घटना मुझे गहरी शक्तियों को भड़काने वाली जैसी लगी. इस समय, मुझे ऐसा महसूस हुआ कि हर समाज बहुत कमजोर है. हर समाज क्रांति से पहले की अवस्था में है और समस्या यह नहीं थी कि वे विस्फोट क्यों हुए बल्कि यह भी थी कि वे कैसे इतने लंबे समय तक इसे सह पाए... समाज की नज़ाकत मेरे लिए बिल्कुल स्पष्ट थी. इसलिए इसकी वजह से मैने न केवल मार्क्सवाद बल्कि इतिहास की किसी भी निश्चयात्मक अवधारणा को भी प्रभावी ढंग से छोड़ दिया […]"

एक समूह, अनेक व्यक्ति

सामूहिक पहचान एक मुद्दा बन गया. "इतिहासकार" के लेबल और विचारधाराओं तथा शिक्षा पर ध्यान दिए बिना समूहों का सामूहिक नेतृत्व करने वाले सामाजिक रिवाजों, कार्यकारी आदतों, बुद्धिजीवी सिद्धांतों द्वारा एकजुट संभावित समुदाय की वास्तविकता के बारे में क्या? तब, यह वह व्यक्ति है जो दिलचस्प बन जाता है. जब हम वैश्विक स्तर पर, जीवन के सीधे या टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर वास्तविक या बनी-बनाई बातों, जोकि नियत के विपरीत या संभावित होती हैं, योजनाबद्ध सफलता के गहरे प्रभाव, जबकि वह "Grandes Ecoles (ग्रांदेकल)" नामक फ्रेंच सिस्टम का परिणाम है और उसके विपरीत विश्वविद्यालय की कमजोरियों या बाधाओं के कारण प्रमुख पदों को हटाने और अंततः परिवर्तनशील दुनिया में हुए परिवर्तनों के प्रति प्रतिरोध या शायद आलस पर सवाल उठाते हैं. इस प्रकार अग्रसक्रिय निर्णय तथाकथित उच्च वर्ग इतिहास, विशेषज्ञों में से एक, "जानकार पक्ष", "अपने बात पर अमल करने वाले लोग", बुद्धिजीवी के लिए लिया जाता है, अगर हमेशा निर्णय लेने वालों द्वारा नहीं, तो कम से कम वे लोग जिनके लिए बुद्धिजीवी और/या संगठनात्मक अवधारणा की संभावना व्यक्ति के प्रति अभिन्नतत्त्व होती है. फिर, और गहराई में जाने पर, विश्लेषण दो उप-समूहों का पक्ष लेता है. पहले समूह का आंकलन, जिसमें मुख्य रूप से "बेबी बूमर्स" थे, क्रॉसओवर अध्ययन को सक्षम किया: किसी उच्च शिक्षा संस्थान का संस्थागत अध्ययन, the École des Chartes, उसकी शिक्षा विधियां, इसके मूल सिद्धांत; दूसरा अध्ययन 1968 में बुद्धिजीवी युवा का सामाजिक अध्ययन था, जो या तो राजनीतिक रूप से सक्रिय या निष्क्रिय थे, अपरिवर्ती, विद्रोही, सुधारवादी थे. दूसरे समूह का विश्लेषण स्पेक्ट्रम को खोल देता है: दूसरे मॉडलों का अनुसरण करके भिन्न वर्गों के "École normale supérieure" छात्रों और/या विश्वविद्यालय छात्रों के साथ साक्षात्कार करना, विशेषकर उनसे जो अलग-अलग पीढ़ियों से हों, 1922-1935 से हों, जिन्हें विश्व युद्ध की यादों, दूसरे विश्व युद्ध के सदमे तथा अल्जीरिया वाद-विवाद के कारण ज़मीर की पुकार द्वारा विभाजित एक आयु वर्ग द्वारा सहे गए आघातों के उत्तराधिकारी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है.

दोहरी संदर्भ संरचना:

सांस्कृतिक और मौखिक इतिहास को, एक साथ मिला दिए जाने पर, एक-दूसरे पर कोई प्रभाव डाले बिना या किसी एक द्वारा दूसरे को पराधीन किए बिना, जानबूझकर किसी विषय के अध्ययन हेतु महत्वपूर्ण ज्ञान केंद्रों के रूप में संदर्भित किया जाता है.

सांस्कृतिक इतिहास

"68 और इतिहासकार" प्रोजेक्ट सांस्कृतिक इतिहास के अनुसरण का दावा करता है, जो किसी सामाजिक समूह के भीतर "बुद्धिजीवियों" से प्रश्न करके प्रतिनिधि-दल का सामाजिक इतिहास है. इस मुद्दे को 68 के "वारिस" या उसके पहले या बाद की सामाजिक-सांस्कृतिक विकृतियों के बगैर इतिहासकारों के रूझान पेश करने वाले कथा समूह पर किए जाने वाले कार्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है."जीवनी संबंधी दांव" की शाब्दिक अभिव्यक्ति के लिए सहमत ऐसे व्यक्ति जिन्हें प्रोसोपोग्राफ़िकल दृष्टिकोण के साथ आग्रह किया गया, अपनी अलग-अलग सामाजिक उत्पत्ति द्वारा चिह्नित अपने अनुभवों के बारे में बताते हैं. लेकिन इसके साथ ही वे सामाजिक समूहों, ऐतिहासिक कार्यों, इसके द्वारा वैज्ञानिकता के श्रेय के साथ बनाई गई साझेदारी, इसे बरकरार रखने वाली रचनात्मक प्रक्रियाएं और वैचारिक उपकरणों (जो कभी-कभी राजनीतिक होते हैं) के विकास पर सामूहिक रूप से जानकारी प्रदान करते हैं जो इसके विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण का पक्ष लेती है.

मौखिक इतिहास

"68 और इतिहासकार" प्रोजेक्ट का उद्देश्य मौखिक इतिहास का उपयोग करके साक्षात्कारों का समूह तैयार करना है. यह दृढ़तापूर्वक कहता है कि यह इतिहासकार-प्रत्यक्षदर्शी और युवा इतिहासकारों के बीच आम सहमति से बने संवाद का उपयोग वैज्ञानिक रूप में करना चाहता है ताकि "बुजुर्ग/विशेषज्ञ" युग्मन को मान्य समझा जाए, जब बातचीत के रूप में, दो लोगों की साझेदारी साझा अनुभवों और विश्लेषणों के प्रत्यक्षदर्शी वृत्तांत का निर्माण करती हो. इस प्रोजेक्ट में बहुत जोखिम है क्योंकि यह जमीनी साक्षात्कारों पर भरोसा करता है. इसलिए, यह सतर्कता के सिद्धांत को स्वीकारता है ताकि यह दूसरों को सुनने के लिए लिखित शब्दों की सीमा, जिसे अकसर बहुत मुश्किल समझा जाता है, से आजाद हो सके. 'अन्य', स्रोत से अभिन्नतत्त्व, 'अन्य', उस वृत्तांत की आत्मा जो इसकी ही आवाज में उलझा हुआ है परंतु इसकी आत्मा से परे, एक यात्रा, स्वयं अपनी यात्रा का वर्णन कर रहा 'अन्य', भावनाएं व्यक्त करता, एक या अनके रूझानों को प्रकट करता 'अन्य', संक्षेप में, 'अन्य' उस समय के अहसासों पर आज अपने विचार प्रकट कर रहा है.

इसलिए, प्रोजेक्ट एक ऐसे पुरालेख के निर्माण, उसके स्वरूपण और आलोचना के लिए उसे प्रकट करने का दावा करता है, जिसे न केवल पूर्व में प्रचलित तरीके से बनाया गया है, बल्कि एक ऐसे सदिश, देखने-सुनने के साधन के रूप में सामने आया है जो स्वयं अनेक ज्ञानमीमांसा संबंधी प्रश्नों के अधीन है. 

जैक्स रेवेल का कथन

"[…] 50वीं सदी के अंत और 70वीं सदी के आरंभ के बीच, सभी सामाजिक विज्ञानों के बीच का संबंध नाटकीय रूप से परिवर्तित हुआ. क्यों? क्योंकि फ़्रांस में, सामाजिक विज्ञान अपेक्षाकृत देरी से और अकादमिक दुनिया के इर्दगिर्द अधिक विकसित हुआ और क्योंकि वे 60 के दशक में स्वतंत्र, अगर हम ऐसा कह सके, हो गए, क्योंकि उनका संस्थानीकरण हुआ – समाज शास्त्र में एक डिग्री होती थी, नृजाति विज्ञान में एक डिग्री हेती थी, भाषा विज्ञान में एक डिग्री होती थी, इत्यादि – और इसलिए भी क्योंकि उन लोगों ने अपनी अस्थायी विचारधारा पा ली थी जो संरचनावाद थी, एक विचारधारा और ज्ञानमीमांसा जो पूर्णतया इतिहासकार विरोधी थी. निजी रूप से, मैंने अकसर कहा है कि संरचनावाद किसी ऐसे देश के इतिहास के संदर्भ में समाज विज्ञान की राजनीतिक स्वतंत्रता से संबंधित एक प्रकार की लड़ाई भी है जहां, काफी लंबे समय से, समाज विज्ञान पर इतिहास हावी रहा है और इसी प्रकार École des Hautes Études का निर्माण हुआ जिसके केंद्र में इतिहास है और समाज विज्ञान इसके चारों ओर फैला है [...]"

आभार: कहानी

- Agnès Callu, chercheur associé au CNRS (IHTP)
- Patrick Dubois, réalisateur multimédia
- Voir, Agnès Callu (dir.) , "Le Mai 68 des historiens", Villeneuve d'Ascq, Presses universitaires du Septentrion, 2010
- Agnès Callu, chercheur associé au CNRS (IHTP)
- Patrick Dubois, réalisateur multimédia
- Voir, Agnès Callu (dir.) , "Le Mai 68 des historiens", Villeneuve d'Ascq, Presses universitaires du Septentrion, 2010

क्रेडिट: सभी मीडिया
कुछ मामलों में ऐसा हो सकता है कि पेश की गई कहानी किसी स्वतंत्र तीसरे पक्ष ने बनाई हो और वह नीचे दिए गए उन संस्थानों की सोच से मेल न खाती हो, जिन्होंने यह सामग्री आप तक पहुंचाई है.
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