श्रीमती मोहिनी मांगलिक: बढ़िया साड़ियों की पारखी
- रूथ चक्रवर्ती
Unknown की Kota sari with chikan embroidery (1950/1975)Lucknow Bioscope
साड़ी एक अनूठा छह गज का बिना सिला हुआ परिधान है जो विभिन्न आकारों और आकारों के अनुकूल होता है और सभी अवसरों के लिए उपयुक्त होता है। लखनऊ में, जैसा कि भारत के कई हिस्सों में होता है, यह कामकाजी महिलाओं और गृहिणियों की पसंदीदा पोशाक रही है। 20वीं सदी की शुरुआत से, लखनऊ की महिलाओं ने मुल्मल, कॉटन, शिफॉन/जॉर्जेट, रेशम और खादी की साड़ियाँ पहनी हैं। ये साड़ियाँ या तो साधारण डिज़ाइन की थीं या फिर चिकन साड़ियों या मखमल/रेशम की कढ़ाई वाली बॉर्डर वाली साड़ियों की तरह बारीकी से कढ़ाई की गई थीं। त्योहारों के अवसरों पर बनारसी साड़ियाँ या मुकेश और जरदोजी के काम वाली बेहतरीन बुनी हुई साड़ियाँ पहनी जाती थीं।
Unknown की Mohini Manglik (2022)Lucknow Bioscope
साड़ी को कमर के चारों ओर लपेटा जाता है और सामने से प्लीट्स बनाई जाती हैं। साड़ी का एक सिरा बाएं कंधे पर ड्रेप किया जाता है, या पीछे से सामने की ओर दाहिने कंधे पर फैलाया जाता है।
प्रो० मोहिनी मांगलिक ('मोहिनी मैम, 1925-2020) - एक उत्कृष्ट शिक्षाविद और लखनऊ विश्वविद्यालय की आचार्या रही श्रीमती मांगलिक के साड़ी पहनने के अंदाज़ में बेमिसाल लालित्य था। मोहिनी मैम एक शिक्षाकर्मी होने के साथ सौन्दर्य-बोध की धनी और कारीगरी की पारखी थीं। वे कारीगरों के कल्याण के प्रति भी समर्पित थीं। वे हर एक वस्तु में सुन्दरता देखने में विश्वास रखती थीं और उनकी यही सोच उनके निजी अन्दाज़ में भी झलकती थी। उनका सौंदर्य-प्रेम उनके साड़ी-संग्रह में भी दिखाई पड़ता था जिसकी हर साड़ी वे बड़ी रम्यता के साथ पहनती थीं।
Unknown की सूती ऑर्गन्डी साड़ी (1950/1975)Lucknow Bioscope
मिसेज मंगलिक चिकनकारी की शौकीन थीं और यह उनके व्यक्तित्व और उनके घर को सुशोभित करती थी। वह रूप, कपड़े और शैली में प्रयोग करने के लिए तैयार थीं। उन्हें चिकनकारी करने वालों, जो ज्यादातर महिलाएं होती हैं, के जीवन में भी समान रूप से रुचि थी और उनका मानना था कि उन्हें जीवन में बेहतर दाम दिया जाना चाहिए।
Unknown की क्रॉस स्टिच की कढ़ाई वाली सूती साड़ी। (2022)Lucknow Bioscope
मोहिनी मैम लखनऊ हस्तकला परिषद की सदस्या थीं और उन्होंने श्रीमती सरला साहनी के साथ मिलकर चिकनकारों के लिए ज़मीनी स्तर पर काम किया था। वे कारीगरों के साथ बैठकर नये-नये डिज़ाइन सोचने और बनाने पर समय देती थीं। श्रीमती मांगलिक एवं श्रीमती साहनी चाहती थीं कि वे चिकनकारी को अपने सबसे सुन्दर और परिष्कृत रूप में पुनर्जीवित करें और उसे कारीगरों के लिए सतत आमदनी का ज़रिया बनाएँ। वे दोनों मानती थीं कि चिकन लखनऊ की ऐसी बहुमूल्य कला है जिसे प्रोत्साहन और प्रेम देकर हमेशा संजोय रखने की ज़रूरत है। हस्तकला परिषद या क्राफ़्ट काउंसिल के लखनऊ चैप्टर की सचिव के रूप में मोहिनी मैम ने महिला कारीगरों के लिए ऐसे नये रचनातक और आर्थिक अवसर खोजे कि वे सदा के लिए एक प्रेरणा-स्रोत बनीं।
सदियों से: साड़ियों में लखनऊ की महिलाएं
1920 से 1970 तक लखनऊ की साड़ी पहने महिलाओं को दिखाने वाली आर्काइवल तस्वीरें
आर्काइवल तस्वीरें जो साड़ियों में महिलाओं को विभिन्न बुनाई और कढ़ाई वाली बॉर्डर के साथ दिखाती हैं।
Unknown की बनारसी कोरा रेशमी (1920)Lucknow Bioscope
1920 की बनारसी बारीक कोरा सिल्क साड़ी, पूरे में पैस्लेदार बूटियों के साथ।
बनारसी साड़ियाँ दो ड्रेपिंग शैलियों में पहनी जाती हैं।
कुछ ब्लाउज़ देखने के लिए नीचे स्क्रॉल करें...
सूती, शिफॉन और रेशम की साड़ियों पर चिकन और मुकैश का काम के कारण लखनऊ की प्रशंसा पूरे भारत में होती है।
इस वीडियो में, पूर्वा नरेश, लखनऊ से एक नाटककार, फिल्म और थिएटर निर्माता, अपनी मातृसास की पुरानी साड़ियों के संग्रह के बारे में बात करती हैं।
Curation: Noor Khan & Saman Habib
Photography: Ayan Bose, Tasveer Hasan
Team: Nagma Ehtesham, Nasreen Khan, Nimra Rizvi, Mariyam Imran, Saman Habib, Noor Khan
Text, Editing and Translation: Saman Habib, Noor Khan, Isha Priya Singh, Waseem Ahmed, Ruth Chakravarty, Stuti Mishra, Divya Joshi
Video: Aisha Khatoon
Gracious Contribution by:
Bhavna Singh & Digvijay N Singh
Bina Agarwal
Mamta Verma
Mukul Manglik
Purva Naresh
Ragini Pandey Misra
Shruti Singh
Vaibhav and Vandita Kaul
Valentina Trivedi
Vasundhara Singh
क्या फ़ैशन में दिलचस्पी है?
अपनी दिलचस्पी के हिसाब से बनाए गए Culture Weekly के अपडेट पाएं
अब आप बिलकुल तैयार हैं!
आपका पहला Culture Weekly इस हफ़्ते आएगा.